Wednesday, October 26, 2022

‘हिंदी साहित्य और सिनेमा’

‘हिंदी साहित्य और सिनेमा’ विषय पर 'साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार और ज्ञानपीठ नवलेखन अनुशंसा पुरस्कार से सम्मानित  चर्चित लेखिका इंदिरा दाँगी' से डॉ. आदित्य मिश्रा की बातचीत-                

                                                                    (चित्र-प्रतीकात्मक, साभार-गूगल डॉट कॉम)
प्रश्न 1. हिंदी साहित्य आधारित कुछ ऐसी फिल्मों के संक्षेप में बताइये जिन्हें आपने देखा हो ? 
उत्तर : यों तो हिंदी के कई एक क्लासिक उपन्यासों और कहानियों पर फिल्में बनी हैं और बन रही हैं । टेलीविज़न की दुनिया में भी धारावाहिक और टेलीफिल्में बनती रहती हैं जो घोषित-अघोषित तौर पर हिंदी साहित्य की रचनाओं पर आधारित या उनसे प्रेरित रहती हैं । मैंने इनमें से कुछेक फिल्में देखी हैं जो हिंदी, बांग्ला या अंग्रे़जी साहित्य की कृतियों पर आधारित हैं । अब तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी आपको कई एक सीरियल ऐसे मिल जायेंगे जो किसी साहित्यिक रचना का चुराया हुआ संस्करण मालूम पड़ते हैं । रजनीगन्धा, तीसरी क़सम , गोदान, शतरंज के खिलाड़ी जैसी कुछ फिल्में मैंने देखी हैं जो हिंदी के उपन्यासों और कहानियों पर बनी हैं ।

प्रश्न 2. क्या ‘हिंदी साहित्य की कथावस्तु एवम्‌ शैली’ सिनेमा जैसे तकनीकी माध्यम के अनुकूल होती है ? 
उत्तर : हिंदी साहित्य ही क्यों, किसी भी भाषा का साहित्य हो, उसको कभी अपने सिनेमा से सर्टिफिकेट लेने की आवश्यकता नहीं है ! सिनेमा को साहित्य की दरकार होती है, साहित्य को सिनेमा की नहीं ! आज हिंदी फिल्में अगर कम सफल हो रही हैं और दक्षिण की फिल्में अधिक सफल तो इसके पीछे मुख्य कारण पटकथा और सम्वाद हैं । ये सब फिल्म को योग्य लेखक से मिल पाता है। अफसोस की बात है कि हिंदी साहित्य की मुख्य धारा के अधिकांश लेखक फिल्म की पटकथा लिखने में रुचि नहीं रखते क्योंकि इसे हमारे यहाँ उच्च दर्ज़ा नहीं दिया जाता साहित्य में । गोकि रेणु, कमलेश्वर और उनसे पहले प्रेमचन्द भी गये फिल्मों की तरफ़ लेकिन ये नाम बहुत थोडे़ हैं; और उसमें से भी प्रेमचन्द का  अनुभव अच्छा नहीं रहा सिनेमा का जैसा कि और भी बहुत सारे लेखकों का कुछ-कुछ ऐसा ही तज़ुर्बा था । सिनेमा वालों की बात करूँ तो उनमें से भी बहुत थोड़े ही लोग होते हैं जिन्हें साहित्य की समझ होती है। और जिनको साहित्य की समझ होती है वे उस पर अच्छी  फिल्में बना ले जाते हैं । 
प्रश्न 3. क्या ‘हिंदी साहित्य पर आधारित हिंदी फिल्में’ दर्शकों के अंदर सिनेमा के प्रति आकर्षण पैदा करने की क्षमता रखती हैं ?
उत्तर. हिंदी साहित्य से वे ही उपन्यास या कहानियाँ फिल्म वाले लेते हैं जो पहले ही या तो क्लासिक का दर्ज़ा पा चुकी हैं या पर्याप्त ख्याति पा रही हैं । कहने का मकसद है कि रचना तो अपनी सफलता और सार्थकता पहले ही सिद्ध कर चुकी है ; अब रहा सवाल फिल्म में आकर्षण पैदा करने का तो ये तो फिल्मकार की योग्यता का सवाल है या कलाकारों की योग्यता का ।
प्रश्न 4. हिंदी साहित्य आधारित फिल्मों की सफलता/असफलता के क्या कारण हो सकते हैं ?
उत्तर : मुझे लगता है कि हमारे हिंदी फिल्म वाले साहित्य की क्लासिक रचना को सही ट्रीटमेंट दें तो उस पर बनी फिल्म भी क्लासिक का दर्ज़ा पा सकती है । विश्व साहित्य में देखिये कितनी ही कृतियाँ हैं जिनपर हर बीस साल बाद फिल्म बनती है और अपूर्व सफलता पाती है । जैक लंदन की ‘कॉल ऑफ़ द वाइल्ड’ पर कितनी बार फिल्में बनी और सफल भी बहुत हुईं ।ओटीटी पर पिछले दिनों मैंने उनकी कहानी ‘लव ऑफ़ लाइफ’ से प्रेरित सीरियल देखा । तमाम पात्र बदले हुए थे लेकिन कहानी की मूल आत्मा वही थी । महान कृति पर फिल्म या धारावाहिक बनाने के लिये पहले साहित्य की समझ होनी चाहिये और फिल्म विधा की भी। 
(इंदिरा दाँगी मूलतः कहानी, नाटक और उपन्यास लेखिका हैं। इनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं- हवेली सनातनपुर, एक सौ पचास प्रेमिकाएँ, शुक्रिया इमरान साहब, रानी कमलापति, रपटिले राजपथ आदि)

    (चित्र-प्रतीकात्मक, साभार-गूगल डॉट कॉम)

हिंदी साहित्य एवं सिनेमा विषय पर फ़िल्म एन्ड थिएटर के प्राध्यापक डॉ. विजय कन्नौजिया से डॉ. आदित्य मिश्रा की बातचीत-  

1- क्या हिंदी साहित्य की कथावस्तु एवं शैली हिंदी सिनेमा जैसे तकनीकि माध्यम के अनुकूल होती है?
उत्तर- जी हां बिल्कुल अनुकूल होती हैं क्योंकि साहित्य और सिनेमा का बहुत गहरा संबंध रहा है। हमेशा से ही साहित्य सिनेमा का दर्पण माना जाता है। साहित्य को समझने के लिए समाज को जानना और समझना बहुत जरूरी होता है। एक अच्छा साहित्य तभी अच्छा होता है, जब वह लोगों के दिल व दिमाग में जगह बना ले और लोग उस पर सोचने के लिए मजबूर हो जाएं। साहित्य आधारित सिनेमा हो या सामान्य फिल्म वह तभी प्रभावित करती है जबकि उसे बनाते समय उसका (ट्रीटमेंट) अच्छे से किया गया हो। तकनीकी के सही इस्तेमाल और रिसर्च के साथ कहानी को सामने लाया जाए तब जाकर एक अच्छा सिनेमा तैयार होता है।
फिल्म और टेलीफिल्म की कथा शैली का अपना व्याकरण है। दर्शक कैमरे की तकनीकी भाषा के आधार पर ही रचनात्मकता को देखते एवं परखते हैं। ऐसी स्थिति में दृश्य-माध्यम की भाषा में ध्वनि सम्प्रेषण की प्रक्रिया को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। उसके लिए यह अनिवार्य है कि अतिरिक्त तकनीक का सहारा लेकर दृश्य माध्यम की भाषा को अभिव्यक्त किया जा सके।
बीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक में एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि लेखक ही अपने साहित्य पर पटकथा लिखने लगे। इन दौर में मुद्राराक्षस, नासिरा शर्मा, के. के. नायर, रेवती रमन शर्मा, दयानंद अनंत, अनवर अजीम, हरिकृष्ण कौल, मृदुला बिहारी आदि ने कई पटकथाएँ लिखीं।


2- क्या हिंदी साहित्य पर आधारित हिंदी फिल्में दर्शकों के अंदर सिनेमा के प्रति आकर्षण पैदा करने की क्षमता रखती हैं?
उत्तर- जी बिल्कुल रखती है साहित्य पर आधारित हिंदी फिल्मों में सबसे पहला नाम यह है जिसकी वजह से साहित्य और सिनेमा का संबंध हमेशा के लिए बहुत गहरा हो गया और वह फिल्म थी -सारा आकाश (1969) जो कि राजेंद्र यादव द्वारा लिखित थी और दूसरी फिल्म थी- 'उसकी रोटी' (1969) मोहन राकेश द्वारा लिखित। यह दोनों फिल्में उपन्यास पर आधारित थीं। यह दोनों फिल्में 1969 में सामने आई थीं और इन दोनों फिल्मों ने नव यथार्थवादी सिनेमा को जन्म दिया जिसकी वजह से हमारा हिंदी सिनेमा आज तक जाना जाता है और हमेशा जाना जाता रहेगाl आप जब इन दोनों फिल्मों को देखेंगे तब आपके अंदर सिनेमा के प्रति आकर्षण पैदा होगा। 

3- हिंदी साहित्य आधारित फिल्मों की सफलता/असफलता के कारण क्या हैं?
उत्तर- देखिये जैसा कि पहले भी कह चुका हूं कि सिनेमा जो है वह साहित्य का दर्पण है और साहित्य समाज का प्रभावी सत्य। हिंदी साहित्य पर आधारित फिल्मों की सफलता/ असफलता का यही कारण हो सकता है कि कोई भी देश जब तक अपने समाज और साहित्य को अच्छी तरह से ना समझ ले तब तक कोई भी देश अपने सिनेमा को सफल नहीं बना सकता अगर हम उदाहरण के लिए इटालियन सिनेमा की बात करें तो उसने वहां पर जब (बाइसिकल थीव्स 1948) जैसी फिल्म बनी, जिसका निर्देशन विटोरियो डी सिका ने किया था यह फिल्म वहां के एक साधारण आदमी की कहानी पर आधारित थी जिसके साइकिल चोरी हो जाती है और उसी को ढूंढने में पूरी फिल्म निकल जाती है। इसी तरह एक और ईरानी फिल्म है-द हेवन ऑफ चिल्ड्रन (1997), इस फिल्म में एक साधारण परिवार के दो छोटे बच्चे है जो कि भाई बहन है, उनकी कहानी को दर्शाया गया है बहुत ही खूबसूरती तरीके से। कहने का मतलब बस इतना सा है कि जब तक हम अपने यहां के साहित्य और समाज को अच्छी तरह से नहीं समझेंगे तब तक उस पर एक अच्छी फिल्म नहीं बनाई जा सकती और अगर आपने साहित्य और समाज को अच्छी तरह से समझ और परख लिया तो आप एक बेहतरीन सिनेमा को जन्म दे सकते हैं।


Sunday, October 2, 2022

 रामा विश्वविद्यालय में ‘जलसा डांडिया उत्सव-2K22’ में युवाओं ने जमकर लगाए ठुमके

रामा विश्वविद्यालय में दिनांक 01 अक्टूबर-2022 को 'जलसा डांडिया उत्सव-2k22' का समापन समारोह हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। डांडिया के लिए सजे मंच के सामने ग्राउंड में युवा शाम 5 बजे से ही जुटने शुरू हो गए थे, जैसे-जैसे समय बीतता गया, भीड़ बढ़ती गयी और उत्साह का पारा भी High होता गया। रात 9:30 बजे तक रामा विश्वविद्यालय और कानपुर के अन्य शिक्षण संस्थानों से आए युवाओं ने जमकर ठुमके लगाए। इससे पूर्व विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में दिनांक 26 सितम्बर से 01 अक्टूबर तक आयोजित इस कार्यक्रम के समापन समारोह की शुरुआत सबसे पहले विश्वविद्यालय के निदेशक, डॉ. प्रतीक सिंह, निदेशक, डॉ. प्रणव सिंह, कुलपति, डॉ. अमरनाथ बी जे, कुलसचिव, प्रभात रंजन, सीओई, आरके यादव,डीन अकादमिक अफेयर्स, प्रो हरिओम शरण, उप कुलसचिव, डॉ. संदीप शुक्ला और मार्केटिंग हेड, संजय कुमार आदि द्वारा मां सरस्वती एवं विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वर्गीय डॉ. बी एस कुशवाह की प्रतिमा के समक्ष पुष्पार्पण के साथ हुई। इस अवसर पर माननीय कुलपति, डीन अकेडमिक अफेयर्स और मार्केटिंग हेड, संजय कुमार ने विद्यार्थियों एवं सभागार में उपस्थित संकाय सदस्यों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित किया। इसके बाद डेकोरेशन, फैंडम क्विज, एकल गायन, युगल गायन, समूह गायन, एकल नृत्य, युगल नृत्य, समूह नृत्य, फैशन शो, काव्य पाठ, लघु फिल्म, फोटोग्राफी और ग्रैफिटी आर्ट प्रतियोगिता के प्रतिभागियों एवं संयोजकों को विश्वविद्यालय के गणमान्य अतिथियों, संकायाध्यक्षों व विभागाध्यक्षों के हाथों मेडल और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर डॉ. ओमवीर सिंह, रामा आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज, प्रो वैशाली धींगरा, डीन, एफसीएम, प्रो. मनीष धींगर, डीन, आर एंड डी सेल, डॉ. जैस्मी मनु, डीन, नर्सिंग, डॉ रविकांत गुप्ता, डीन, एफजेस, डॉ. अनीता यादव, डीन, एग्रीकल्चर एंड अलॉयड इंडस्ट्रीज, डॉ. कामरान जावेद नकवी, डीन, फार्मास्यूटिकल साईंसेज, डॉ. विकास सिंह, डीन, एफपीएस, सचिन चौधरी, सीनियर ब्रांड मैनेजर समेत विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, फैकल्टी मेंबर्स, गैर-शैक्षणिक अधिकारी- कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।