Sunday, March 22, 2026

चाची तुम रोओ मत... मैं अंग्रेजों से बदला लूंगा- भगत सिंह

हर भारतीय को जानना चाहिेए भगत सिंह का ये किस्सा...

बालक भगत सिंह अपनी चाची के साथ (Gemini_Generated_Image)

23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फांसी दी गयी थी। आज भगत सिंह समेत उनके साथियों को विशेष तौर पर याद किया जाता है। पढ़िये भगत सिंह और उनके साथियों को समर्पित यह लेख-

लिख रहा हूं अंजाम जिसका

कल वो आगाज आएगा

मेरे लहू का हर कतरा

इंकलाब लाएगा

मैं रहूं या ना रहूं

ये वादा है मेरा तुमसे

मेरे बाद वतन पर...

...मरने वालों का सैलाब आएगा


करीब तीन साल की उम्र का एक लड़का, अपने पिता के साथ खेत में गया। अचानक पिता की उंगली छोड़, खेत में जा बैठा और पौधों की तरह तिनकों को जमीन में गाड़ने लगा।

पिता ने पूछा- क्या कर रहे हो बेटा?

तोतली आवाज में जवाब मिला- बंदूकें बो रहा हूं।

ब्रिटिश हुकूमत की खिलाफत के कारण इसके चाचा अजीत सिंह के नाम गिरफ्तारी का वारंट निकल चुका था। अंग्रेज अधिकारी उन्हें फाँसी देना चाहते थे। लेकिन सरकार की आँखों में धूल झोंककर वह देश से बाहर चले गये। उनके चाचा का देश से बाहर जाना, चाची का शोक और भगत सिंह की प्रतिक्रिया इतिहास का वह कड़वा सच है जिसे जानकर हर भारतीय की आंखें नम हो जाती हैं और भगत सिंह के प्रति अपार सम्मान का भाव प्रकट होता है।  

 चाची का रुदन और बालक भगत का संकल्प

यह किस्सा तब का है जब भगत सिंह बहुत छोटे थे। उनके चाचाअजीत सिंह, एक महान क्रांतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजों ने देश निकाला दे दिया था। चाचा के बिछड़ने के गम में भगत सिंह की चाची अक्सर रोया करती थीं। एक दिन बालक भगत ने अपनी चाची को सिसकते हुए देखा।

नन्हे भगत अपनी चाची के पास गए, उनके आंसू पोंछे और बड़ी मासूमियत लेकिन दृढ़ता के साथ कहा:

"चाची, तुम रोओ मत... मैं बड़ा होकर अंग्रेजों से बदला लूंगा और चाचा को वापस लेकर आऊंगा।"

यह केवल एक बच्चे की सांत्वना नहीं थी, बल्कि उस महानायक की पहली गर्जना थी जिसने आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।

भगत सिंह का परिवार देशभक्तों का परिवार था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों ही आजादी की लड़ाई में सक्रिय थे। एक बार जब उनके पिता खेत में काम कर रहे थे, तो बालक भगत वहां 'बंदूकें बोने' की बात कर रहे थे ताकि ढेरों बंदूकें पैदा हों और वे अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल सकें।

चाची से किया गया वह वादा उनके जीवन का ध्येय बन गया। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत खुशियों को कभी प्राथमिकता नहीं दी। उनके लिए 'आजादी' ही उनकी दुल्हन थी।

भगत सिंह ने अपनी चाची से किया वह वादा निभाया। भले ही वे अपने चाचा को वापस नहीं ला सके, लेकिन उन्होंने पूरे देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ एक से बढ़कर एक कारनामे किये। साईमन कमीशन के विरोध के दौरान अंग्रेज सिपाहियों ने स्कॉट के नेतृत्व में लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाकर उन्हें लहूलुहान कर दिया, जिससे वे शहीद हो गये।

भगत सिंह और उनके साथियों ने स्कॉट की हत्या करके लालाजी की मौत का बदला लेने की ठानी। 17 दिसंबर को हत्या का दिन तय हुआ। सांडर्स दफ्तर से बाहर निकला और अपनी मोटर साईकिल पर सवार होने लगा। क्रांतिकारियों ने उसे ही स्कॉट समझ लिया।पहली गोली राजगुरु ने चलाई। और सांडर्स वहीं ढेर हो गया। भगत सिंह ने तीन-चार गोलियां और दाग दीं कि बचने की कोई आशंका ना रहे। सांडर्स का काम तमाम करके भगत सिंह और राजगुरु भाग निकले।

अगली सुबह लाहौर की दीवारों पर गुलाबी रंग के पोस्टर चिपके थे, जिनमें लिखा था-

“जे पी सांडर्स की हत्या से लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया गया है।”

अंग्रेजों की क्रूरता बढ़ती जा रही थी, इधर भगत सिंह और साथी अंग्रेजों को सबक सीखाने और उन्हें देश से बाहर करने में निडर होकर काम करते रहे।
एक दिन ऐसा भी आया जब भगत सिंह ने दिल्ली केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने का निर्णय कर लिया और कलकत्ता से आगरा आए। मौका मिलते ही चन्द्रशेखर और दूसरे साथियों से चर्चा की, असेम्बली में बम धमाका के लिए  सभी सहमत हो गये। 

धीरे-धीरे असेम्बली में बम फेंकने का दिन आ ही गया। भगत सिंह और बटुकेश्वर पूरी तैयारी के साथ असेम्बली में पहुंचें। 8 अप्रैल का दिन थाट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल को असेम्बली में बहुमत से रद्दकर दिया गया। उसी समय भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंक दिया।

वहां मौजूद अंग्रेज पुलिस और अधिकारी घबराए हुए थे। जब भगत सिंह ने अपनी पिस्तौल एक डेस्क पर रख दिया तब अंग्रेज पुलिस अफसरों की जान में जान आई और भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार करके सेशन जज की अदालत में पेश किये गये।
भगत सिंह और उनके साथियों पर एक विशेष अदालत में मुकदमा चलाया गया। हुआ वही जिसका डर था, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गयी।
पूरे देश में यह खबर आग की तरह फैल गयी और भगत सिंह को छुड़ाने के लिए देश भर में आंदोलन चलने लगे। 
अंग्रेजी हुकूमत भगत सिंह की लोकप्रियता से घबराई हुई थी और जल्द से जल्द उन्हें फांसी पर लटका देना चाहती थी। 23 मार्च 1931 की शाम 5 बजे सेंट्रल जेल लाहौर में दूसरे कैदियों की गिनती करके अपनी-अपनी बैरकों और कोठरियों में डाल दिया गया। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की काली वर्दी पहनाकर फाँसी वाले स्थान पर लाया गया। तीनों ही इंकलाब जिन्दाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। तीनों खुशी-खुशी फाँसी पर लटक गये। इन क्रांतिकारियों की शहादत के करीब 16 साल बाद अंग्रेज देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर हुए। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। आज भी इन क्रांतिकारियों को याद करके हिंदुस्तान का बच्चा-बच्चा गीत गाता है-

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...

 

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