Sunday, February 15, 2015

जातिवाद बनाम शिक्षा

जाति और धर्म हमारे देश में लोगों की पहचान से जुड़ा मुद्दा है। पहले समाज में इस तरह के जुमले खुलेआम प्रयोग किये जाते थे कि अमुक व्यक्ति उच्च जाति का है, अमुक निम्न जाति का है। अमुक जाति के व्यक्ति को यह काम नहीं करना चाहिए या अमुक जाति का होकर भी अमुक व्यक्ति यह काम करता है। कुल मिलाकर आजादी के पूर्व जातिवाद अपने विभत्स रुप में था। आजादी के बाद स्थिति बिल्कुल सुधर गई हो ऐसा नहीं कहा जा सकता, फिर भी हम देखते हैं कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार और संविधान से मिले समानता के अधिकार की वजह से लोगों में कुछ जागरुकता आई है।  
     छूआछूत के खिलाफ गांधी जी के प्रयत्नों और अम्बेडकर जी कार्यों की आज भी सराहना होती है। हमारे महापुरुषों के योगदान हमें जात-पात का भेद भुलाकर एक होने की प्रेरणा देते हैं फिर भी समाज में जातिवाद की समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही है? इस विषय पर विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि हमारे समाज से जातिवाद के खत्म न होने के पीछे बहुत हद तक हमारे देश का राजनैतिक और जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त बौद्धिक (लेखक) वर्ग जिम्मेदार है। हमारे देश में कई राजनीतिक दल जातियों के आधार पर टिके हैं। किसी पर अगड़ी जातियों की पार्टी होने का नाम चस्पा है तो, कोई पिछड़े वर्ग का नेता कहलाता है, कोई दलितों का मसीहा बनता फिरता है तो कोई अगड़ा-पिछड़ा समीकरण बनाकर अपनी राजनैतिक नैया खेता नजर आता है। हालांकि प्रत्येक राजनीतिक दल समाज के सभी वर्गों का वोट हासिल करना चाहता है फिर भी जाति विशेष के नेतृत्व और उसी पर सर्वाधिक भरोसे की वजह से कोई न कोई विशेष राजनीतिक दल समय-समय पर कोई न कोई ऐसा बयान या नीति जारी कर ही देता है जिससे उसके विरोधी विचारों वाले दल भड़क जाते हैं और उनके समर्थक सड़कों पर उतर आते हैं। एक दल के समर्थकों के प्रतिउत्तर में दूसरे दल के समर्थक भी मैदान में उतरने से गुरेज नहीं करते। परस्पर विरोधी बयानों और आंदोलनों की वजह से जातिवाद की खाई पहले की अपेक्षा और चौड़ी हो जाती है। फेसबुक-ट्विटर और ब्लॉग जैसे सामाजिक माध्यमों के दुरुपयोग से यह खाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही। अपनी जाति के नेता के बयान या चुनावी जीत-हार पर उसके समर्थक इन माध्यमों पर कठोर शब्दों में विरोधियों पर हमला बोलते हैं और अपनी खुशी का इजहार करते नज़र आते हैं। बदले में विरोधी खेमे के समर्थक भी नफरत फैलाने वाले शब्दों और जुमलों के साथ उसी अंदाज में जवाब देते हैं। जातिवाद की खाई को फैलाने का ये युद्ध सामाजिक माध्यमों पर तब तक चलता रहता है जब तक कोई नया मुद्दा न आ जाए।
            शिक्षित युवाओं में जातिवाद को लेकर एक दूसरे से नफरत करना बहुत ही गंभीर समस्या है। प्रायः हमारे युवा एक दूसरे की सफलता-असफलता पर सच्चे मन से साथ रहते हैं। जीत पर बधाई और हार पर दिलासा देना हमारी परंपरा रही है। कोई भी छात्र अपनी कक्षा में प्रथम आता है या कोई भी खिलाड़ी क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाता है, फुटबाल में सर्वाधिक गोल करता है या अन्य किसी भी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करता है तो उसके प्रदर्शन के आधार पर उसकी तारीफ होती है। इस बीच आज समाज में लेखकों का एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो जातियों के आधार पर प्रदर्शन को आंकने लगा है और उसी आधार पर वह तारीफों के पुल बांधता है। ऐसे लेखक किताबों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त सामाजिक माध्यमों की सहायता से अपने जाति आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करने लगे हैं। सामाजिक माध्यमों पर ऐसे विचारों का प्रचार-प्रसार और प्रतिक्रियाएं बड़ी ही तेजी से हो रही हैं। जिसका दुष्परिणाम जाति के आधार पर एक-दूसरे से नफरत करने, एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार न होने के रुप में आ रही है। कुछ लेखक जातिवादी मानसिकता से ग्रसित होकर मीडिया, खेल, सिनेमा, शिक्षा, रोजगार आदि क्षेत्रों में जाति विशेष के लोगों की संख्या और स्थिति का आंकलन करते हैं और उसका विश्लेषण नमक-मिर्च लगाकर नफरत फैलाने वाले शब्दों में करते हैं। महापुरुषों तक को ये लोग जातियों के आधार पर बांट लेते हैं। एक जाति के महापुरुष या प्रतीक को, दूसरे जाति के महापुरुष या प्रतीक के दुश्मन के रुप में दिखाया जाता है। जिन्हें अपने लेखों और सुविचारों का प्रचार प्रसार दूर-दराज के गांवों में जागरुकता फैलाने के लिए करना चाहिए वे लोग स्कूल-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षित लड़के-लड़कियों को साजिश के तहत अपना कुत्सित बौद्धिक ज्ञान देते हैं। इनके द्वारा नफरत फैलाने वाले साहित्य बांटे जाते हैं। ये खुद को इन विद्यार्थियों का मार्गदर्शक बना लेते हैं और दूसरे जाति के लोगों द्वारा किसी समय विशेष पर किये गये किसी प्रकार के अत्याचार को सार्वभौमिक सत्य बताकर दूसरे जाति के खिलाफ इन्हें भड़काते हैं और इनके नैसर्गिक विकास में बाधा बन जाते हैं। प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि दूसरों को ज्ञान देने वाले नेता और सामाजिक चिंतक अपना नीजि फायदा देखते ही विरोधी खेमे के शीर्ष नेतृत्व से हाथ मिला लेते हैं और उनके समर्थक खुद को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। ऐसे में समाज के शिक्षित युवाओं की यह जिम्मेदारी है कि शिक्षा का यथासंभव प्रचार-प्रसार करें और नफरत फैलाने वाले लोगों को अपना मार्गदर्शक या हितैशी कदापि न समझें। लोगों का जाति-धर्म की बजाय उनके कार्य एवं व्यवहार के आधार पर आंकलन करें और उनसे सम्पर्क बनाए। जातिवाद की खाई को चौड़ा होने से रोकने के लिए प्रतिक्रियावादी होने की बजाय संयम से काम लेना होगा और ऐसे नेता, लेखक या मार्गदर्शक को समर्थन देने से गुरेज करना होगा जो एकतरफा ज्ञान देते हों। इस बात का ध्यान तो सदैव रखना होगा कि अच्छा व्यक्ति कभी दूसरों से नफरत करने या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं करता। जो व्यक्ति या संस्था ऐसा करे उनसे दूर रहना होगा। इस संबंध में मीडिया और कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।   

Thursday, January 8, 2015

मोबाइल है मगर शौचालय नहीं.


 
 गंदगी से बीमारी फैलती है। जगह-जह फैला कचरा और खुले में शौच बीमारी को बुलावा देने जैसा है, ये जानने के बावजूद भारत में गंदगी की समस्या एक आम बात है। लोग अपना घर-द्वार तो साफ ऱखना जानते हैं लेकिन यही लोग सड़कों पर कूड़ा-कचरा फेंकने से बाज नहीं आते।  रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों, रेल की पटरियों पर आम लोग निसंकोच केले का छिलका, बिस्कुट-नमकीन के पैकेट, खाने के पैकेट, पानी और कोल्डड्रिंक्स के बॉटल आदि फेंक देते हैं। कई बार सार्वजनिक स्थानों पर सफाई से संबंधित दिशा निर्देश या प्रेरक संदेश लिखे रहते हैं जैसे 'आप जो गंदगी फैला रहे हैं, उसे आप जैसा ही कोई इंसान साफ करता है।' इसके बावजूद लोग गंदगी फैलाने से नहीं चूकते। आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों, ट्रेनों आदि में उपलब्ध शौचालयों के उपयोग में भी लोग सावधानी नहीं बरतते और अपना काम निपटाकर दूसरों के लिए समस्या छोड़ जाते हैं। सार्वजनिक शौचालय में गंदगी की समस्या में, सफाईकर्मियों की संख्या में कमी या उनकी लापरवाही के अतिरिक्त जनता की गलत आदतों का योगदान भी रहता है। लोग ट्रेन के शौचालयों में पर्याप्त पानी नहीं डालते या डालते भी हैं तो इधर-उधर पानी फैला देते हैं जिससे उनके बाद के व्यक्तियों के लिए समस्या खड़ी हो जाती है।
                          व्यक्तिगत स्तर पर गांवों में लोगों के घरों में शौचालयों का न होना एक बड़ी समस्या का रुप ग्रहण कर चुका है। आश्चर्य की बात है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों के घरों में टेलीविजन और डीटीएच के कनेक्शन मौजूद हैं। एक घर में दो-दो, तीन-तीन मोबाइल या परिवार के अधिकांश सदस्यों के हाथ में मोबाइल है। इनमें से कुछ लोग मोबाइल पर इंटरनेट के प्रयोगर्ता हैं। इस प्रकार के लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है लेकिन इनमें से अधिकांश के घरों में शौचालय नहीं है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की मासिक पत्रिका कुरुक्षेत्र के दिसंबर 2014 के अंक मुताबिक वर्ष 2011 में ग्रामीण क्षेत्रों के आधे से ज्यादा घरों में मोबाइल अथवा टेलिफोन थे जबकि इसकी तुलना में सिर्फ एक तिहाई घरों में ही शौचालय बने थे। केंद्र सरकार के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों की सरकारें लोगों के घरों में शौचालय निर्माण के लिए कार्य करती आई हैं लेकिन इतनी विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां की अधिकांश जनता गांवों में ही निवास करती है, प्रत्येक घऱ में शौचालय निर्माण करा पाना सरकारों के लिए बहुत कठिन कार्य है। सरकारों द्वारा कागजों में सभी के घरों में शौचालय के निर्माण हो सकते हैं लेकिन हकीकत में सभी के घरों में शौचालय का निर्माण लोगों की व्यक्तिगत पहल के बगैर संभव नहीं है।
                          केंद्र सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को खुद हाथ में झाड़ू लेकर दिल्ली के वाल्मिकी बस्ती में सफाई करके 'स्वच्छ भारत अभियान' की शुरुआत क'स्वच्छ भारत अभियान'के एक भाग के रुप में प्रत्येक पारिवारिक इकाई के अंतर्गत घरेलू शौचालय की इकाई लागत को 10000 से बढ़ाकर 12000 रुपये कर दिया गया है और इसमें हाथ धोने, शौचालय की सफाई एवं भंडारण को भी शामिल किया गया है। इस तरह के शौचलय के लिए सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायता 9000  और इसमें राज्य सरकार का योगदान 3000 रुपये होगा। जम्मू एवं कश्मीर एवं उत्तरपूर्व राज्यों एवं विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलने वाली सहायता 10800 रुपये होगी जिसमें राज्य का योगदान 1200 रुपये होगा। अन्य स्रोतों से अतिरिक्त योगदान करने की स्वीकार्यता होगी।
                  जो लोग मोबाइल खरीद सकते हैं, डीटीएच के कनेक्शन ले सकते हैं, मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं उनके घरों में शौचालय का न होना उनकी लापरवाही को ही दर्शाता है। ऐसे लोगों को न सिर्फ अपने घरों पर अपने खर्चे पर शौचालय का निर्माण कराना चाहिए बल्कि अपने आस-पास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए। ग्रामीण तबके के पढ़े-लिखे लोग सरकार द्वारा मिल रहे सहायता राशि की जानकारी आमलोगों तक पहुंचा सकते हैं। सरकारी योजना का लाभ सामान्य ग्रामीण ले सकें इसके लिए ग्राम-प्रधान व संबंधित इकाई से संपर्क कर प्रत्येक घर में शौचालय का निर्माण सुनिश्चित कराया जा सकता है।ग्रामीण क्षेत्रों में शौच जाते समय किसी युवती या महिला के साथ बलात्कार या बलात्कार की कोशिश की खबरें हमें आए दिन समाचार पत्रों में देखने को मिल जाती हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक घर में शौचालय के निर्माण हो जाने से लोगोंको न सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभ होगा बल्कि युवतियों और महिलाओं के साथ शौच जाते समय होने वाली छेड़खानी और बलात्कार की घटनाएं रोकी जा सकती हैं।

Tuesday, January 6, 2015

BOSS इज ऑलवेज राइट

BOSS तो BOSS होता है,
मक्खन उसे बहुत पसंद होता है..
खुद गलतियों पर गलतियां करता है,
बड़ी-बड़ी गलतियां करता है..
लेकिन दूसरों की छोटी से छोटी गलती,
BOSS को बर्दाश्त नहीं होती..
दूर मत जाइये, मेरे छोटे BOSS को देखिये,
7 दिन में कम से कम 14 गलती तो कर ही देता है..
और अपनी गलती पर हंसता भी खूब है,
लेकिन अगर मैं 14 दिन में एक भी गलती कर दूं तो
छोटा BOSS, छोटा राजन बन जाता है..
जोर-जोर से चिल्लाता है, उल्टे- सीधे आरोप लगाता है,
फिर बड़े BOSS के गुफा में चला जाता है..
फिर शुरू हो जाती है, चम्मच और मक्खन की कहानी,
लड़का बिगड़ गया है BOSS, काम में इसका मन ही नहीं लगता..
ये है - वो है, ऐसा है – वैसा है,
चल नहीं पायेगा BOSS, ऐसे चल नहीं पायेगा..
फिर बड़ा BOSS अपने गुफा रूपी केबिन से निकलता है,
बड़ा BOSS हालांकि समझदार होता है..
लेकिन छोटे BOSS का मक्खन उसके सिर चढ़कर बोलने लगता है,
तौम... तौम ऐसा करते हो, तौम... तौम वैसा करते हो..
तौमको... तौमको तो मैं अच्छा लड़का समझता था,
तौम भी औरों की तरह बन रहे हो..
दैखो... दैखो चल नहीं पाएगा, ऐसे चल नहीं पाएगा,
मुझे समझ में नहीं आता कि किधर देखूं..
चारों तरफ क्वैश्चन मार्क ही क्वैश्चन मार्क नज़र आते हैं,
नौकरी हाथ से गई सी दिखती है..
तभी अचानक BOSS के रंग बदल जाते हैं,
बोलता है मन लगाकर काम करो
दुबारा मैं तुम्हारी शिकायत सुनना नहीं चाहता..   
BOSS की अंतिम बात सुनते ही नौकरी बच जाती है
और मुंह से अपने आप निकलता है,
BOSS इज ऑलवेज राइट।

Sunday, August 15, 2010

मेरा गोरखपुर शहर

जहाँ  बाबा राघव   मेडिकल कॉलेज    है
जहाँ    दीनदयाल    विश्वविद्यालय है।
जहाँ   गोरख   बाबा     का     मंदिर    है.
जो    सबके     दिलों     के    अंदर     है।
जो    कबीर     प्रेम     कि     धरती     है 
जहाँ       बुढ़िया      माई     रहती     है।
जहाँ  जनता  गोरखनाथ  की  पुजारी  है.
जहाँ  से   हारा    मनोज     तिवारी    है।
जहाँ    धर्म-संस्कृति     का    राज़     है.
जिस पर  सदा  ही  हमको  को  नाज़  है।  
जहाँ      विकास       की       लहर      है.
वहीँ      मेरा     गोरखपुर      शहर    है।



गोरखपुर विश्वविद्यालय









Tuesday, March 23, 2010

अटल बिहारी वाजपेयी


परिचय
अटल बिहारी वाजपेयी (जन्म दिसंबर २५, १९२४) १९९६ तथा १९९८ से मई २००४ तक भारत के प्रधान मंत्री थे । उनका जन्म मध्य प्रदेश में ग्वालियर में हुआ था और वह जीवनभर भारतीय राजनीति में सक्रिय hain वह भारतीय जन संघ की स्थापना करने वालों में से एक है और १९६८ से १९७३ तक वह उसके अध्यक्ष भी रह चुके हैं । १९५७ में वह पहली बार भारतीय संसद में चुने गये और १९७७ में जनता पार्टी की स्थापना तक वह उसके नेता रहे । मोरारजी देसाई की सरकार में वह १९७७ से १९७९ तक विदेश मंत्री रहे । १९८० में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की। १९८० में बनी भारतीय जनता पार्टी के वे पहले अध्यक्ष भी रहे । वे राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं । मेरी इक्यावन कविताएं वाजपेयी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है ।
अटल जी की पत्रकारिता
एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई. उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

 
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है



दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज



किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार



दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

                                       KAVI-ATAL BIHARI VAJPAI

क़दम मिलाकर चलना होगा




बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।



हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।


कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।
                                             
                               KAVI - ATAL BIHARI VAJPAI