Thursday, May 14, 2020

*केविवि के विद्यार्थियों ने 'शेयर बाज़ार में समकालीन मुद्दे' विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान में की भागीदारी*


प्रबंधन अध्ययन संस्थान, गाज़ियाबाद के निदेशक प्रो. आलोक पाण्डेय व दिल्ली विवि के सह प्रोफेसर डॉ अमित कुमार सिंह ने बतौर विशेषज्ञ की शिरकत*


*कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने दी बधाई, प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.पवनेश कुमार ने व्याख्यान को बताया उपयोगी*

(24 अप्रैल )
महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों के लिए शुक्रवार (24, april) को 'शेयर बाज़ार में समसामयिक मुद्दे' विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में प्रो. आलोक पाण्डेय निदेशक, प्रबंधन अध्ययन संस्थान, गाज़ियाबाद और डॉ. अमित कुमार सिंह, सह प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, दिल्ली विवि, दिल्ली ने बतौर विशेषज्ञ शिरकत की। प्रो. पाण्डेय ने अपने संबोधन में शेयर बाज़ार का मतलब, प्राइमरी मार्केट, सेकेण्डरी मार्केट, म्यूचुअल फंड, रेगुलेशन, इकॉनॉमिक ग्रोथ, लो इकॉनॉमिक ग्रोथ आदि को बड़े ही सरल शब्दों में विस्तार से बताया। कोरोना जैसे वर्तमान वैश्विक संकट के प्रभाव को चार्ट और ग्राफ के जरिये समझाते हुए कहा कि अब भारत की ग्रोथ रेट 0.8 से आगे बढ़ेगी, जबकि विश्व के कई मजबूत देश शून्य से भी नीचे के ग्रोथ रेट अर्थात निगेटिव से ऊपर उठेंगे। भारत के विकास दर के बारे में कहा कि पिछले 4-5 सालों से हमारी ग्रोथ रेट गिरी है। इसके कई कारण हैं। जीएसटी के बारे में लोग समझ नहीं पा रहे हैं। जबकि अगर इसे सही से लिया जाए तो काफी विकास किया जा सकता है। प्रो. पाण्डेय ने विद्यार्थियों से बैंजेमिन ग्राहम की किताब पढ़ने का सुझाव दिया।

वहीं अपने संबोधन में डॉ. अमित ने कहा कि स्टॉक मार्केट को पढ़ते समय ठीक-ठीक वैल्यूएशन करने का गुण आना चाहिए। हम जो शेयर बेचते या खरीदते हैं उसका वैल्यू पता हो तो ही हम फायदा कमा सकते हैं। एक शेयर का जो दाम दिख रहा होता है, वास्तव में वो है या कुछ और है इसका अनुमान लगाना आवश्यक है। कभी-कभी लो इकॉनॉमिक ग्रोथ के समय में अच्छी कम्पनी का शेयर कम दिखता है और खराब कम्पनी का शेयर अच्छा दिखता है। इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए। आगे कहा कि इन्वेस्ट करते समय कम्पनी का मालिक बनकर सोचिये। कंपनियां जानती हैं कि हालत बदलते रहेंगे मानव व्यवहार नहीं बदलेंगे। उदाहरण देते हुए बताया कि टाइटन ने पहले घड़ी बेचने से शुरुआत की फिर तनिष्क ज्वैलरी की शुरुआत की और फिर चश्मा के बिजनेस में आ गई और टाइटन आई प्लस आ गया। टाइटन को आए 18 साल हो चुके हैं, उसका नाम लोगों के जेहन से नहीं जा रहा है। लोग आज भी इंवेस्टमेंट कर रहे हैं।

इस चर्चा में नागपुर से जुड़े डॉ. मनीष व्यास, डॉ. तपन घोष, प्रबंधन विभाग के शोधार्थी सिद्धार्थ घोष आदि ने कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे जिनका जवाब प्रो. पाण्डेय और डॉ. अमित ने बारी-बारी से दिया। प्रो. तपन नायक के एक सवाल के जवाब में प्रो. पाण्डेय ने कहा इंडस्ट्री को अगले 1-2 साल बहुत सतर्क रहना होगा और आपको बतौर इन्वेस्टर, इंवेस्ट करते समय सिर्फ इंडस्ट्री नहीं बल्कि कम्पनी
भी देखनी है। गलत नीतियों के कारण बंद हुए उड़ीसा के वेदांता प्लांट और भोपाल के यूनियन कार्बाईड कम्पनी का उदाहरण देते हुए कहा कि आप जिस कम्पनी में इन्वेस्टमेंट करने जा रहे हैं उसका एनुवल रिपोर्ट जरुर पढ़िये। गौर कीजिये कि वे कोई बड़ा कर्ज तो नहीं लिये हैं। कानून का पालन तो कर रहे हैं!

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने संदेश में प्रसन्नता जताते हुए कहा कि इस कठिन दौर में भी विवि के विद्यार्थियों को घर बैठे ही शेयर बाजार के विभिन्न पहलूओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई। प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्ययक्ष, शिक्षकगण एवं विद्यार्थी इसके लिए बधाई के पात्र हैं।

वहीं प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने कहा कि यह व्याख्यान विद्यार्थियों, शोधार्थियों के साथ ही साथ हम सभी शिक्षकों के लिए भी बहुत ही उपयोगी साबित हुआ है। कोरोना जैसे वैश्विक संकट के दौर में शेयर बाजार में किस तरह निवेश करना है, आगे क्या स्थिति रहेगी, देश के आर्थिक विकास पर इसका क्या असर पड़ेगा इन बिंदुओं पर सभी को संतोषजनक जानकारी मिली है। प्रो. पवनेश ने इसके लिए प्रो. पाण्डेय और डॉ. अमित का ह्रदय से आभार भी जताया। इस ऑनलाइन व्याख्यान को अपनी सक्रिय उपस्थिति से सफल बनाने के लिए उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थियों और शेयर बाजार में रुचि रखने वाले सहभागी विद्वानों का भी आभार जताया। विद्यार्थियों-शोधार्थियों की तरफ से सिद्धार्थ घोष ने दोनों विशेषज्ञ व्याख्याताओं का आभार जताया साथ ही कार्यक्रम को बहुत ही उपयोगी बताया। इस ऑनलाइन व्याख्यान में प्रो. तपन नायक, डॉ. सपना सुगंधा, डॉ. दिनेश व्यास, कमलेश कुमार आदि शिक्षक, शशि रंजन, अविनाश कुमार, रौशन कुमार, अंकित वर्मा, देवाशीष राज, दीपू सिंह, हर्षवर्धन, कन्हाई शर्मा, शैलेष सिंह, श्वेता कुमारी, श्यामली कुमारी समेत बड़ी संख्या में शिक्षकों, विद्यार्थियों एव शोधार्थियों ने सहभागिता की।

Tuesday, May 5, 2020

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और युवा मन


डॉ.आदित्य कुमार मिश्रा-गोरखपुर, साथ में अजय कुमार, सुधाकर ओझा, राजकुमार पाण्डेय, उमेश तिवारी व शशांक द्विवेदी।
           सूचना एवं संचार क्रांति के युग में फेसबुक-ट्विटरवाट्सअप और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल माध्यमों के द्वारा बड़ी संख्या में लोगों की अभिव्यक्तियां सामने आ रही हैं। उपयोगकर्ताओं की मानसिकता के अनुसार ही कंटेट सामने आता है। इनमें से कुछ लोग कुछ विशिष्ट सूचनाएं देनेमनोरंजक विषय वस्तु प्रस्तुत करने और जागरुकता फैलाने का कार्य इन प्लेटफॉर्मों पर करते हैंजिसे पढ़कर या देख-सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। वहीं इन माध्यमों पर कुछ लोग नफरत से भरा संदेश डालते हैं तो कुछ लोग उस संदेश से प्रेरित होकर अपनी मुर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया डालते हैं और कुछ लोग लाइक और शेयर करके इस नफरत की आग को फैलाते रहते हैं। कुछ लोग अपने पुत्र-पुत्रीपड़ोसीरिश्तेदार और सेलिब्रिटी या दिवंगत महापुरुषों की जन्मदिनशादी की वर्षगांठपुण्यतिथि आदि अवसरों पर चित्र-विडियो और टेक्स्ट के सहारे अपनी शुभकामना या संवेदना व्यक्त करते हैं। शुभ-अवसरों के संदेशों की आवृत्ति भी एक सीमा के बाद चिड़चिड़ाहट पैदा करती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर इनकी आलोचना तंगदिली की निशानी हो सकती है इसलिए इस ओर ज्यादा कुछ नहीं कहना। लेकिन एक तरफ के लोगों द्वारा नफरत फैलानेबैठे-बिठाये प्रधानमंत्री कोवित्तमंत्री कोमुख्यमंत्री और पुलिस प्रशासन आदि को सलाह देनेताना मारने, ‘सच-झूठ’ जो भी मिले उसे नफरत की चाशनी में डालकर परोसने का काम किया जाता है तो दूसरी तरफ के लोगों द्वारा विपक्षी दल के नेताओंअपने से अलग विचारधारा के कलाकारों की अमर्यादित शब्दों और प्रतीकों से आलोचना करने का काम किया जाता है। दोनों ही खेमों का साथ देने वाले लोग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं। न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में भी एजेंडा के तहत आलोचनात्मक या चाटुकारितापूर्ण प्रसारण-प्रकाशन को पहचानना-समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। समाचार चैनलसमाचार पत्रसोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म हमारी दिनचर्या के हिस्सा बन चुके हैं। इन माध्यमों के बारे में कुछ न कुछ राय सभी के मन में होती है। इस संदर्भ में लालबाहदुर शास्त्री प्रबंधन संस्थान की प्रो. तृप्ति बर्थवाल का एक कथन बड़ा ही महत्वपूर्ण हैं जिसमें वह कहती हैं दिन भर न्यूज मत देखिये। देश-दुनिया से थोड़ा अवेयर ज़रुर रहिये, मगर मीडिया की अति से बचिये। ओवर इटिंग से वॉमेटिंग और डायरिया होती है। टीवी-न्यूज पेपर और सोशल मीडिया से कुछ अलग भी कीजिये। प्रो. बर्थवाल का यह कहना जायज है कि मीडिया से खबरों का ओवरडोज लेना ठीक नहीं है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हाथों में एंड्रायड मोबाइल और सस्ता डेटा लेकर आदमी करे तो क्या करे। वामेटिंग और डायरिया होता है तो हो जाए, आम लोग विशेषकर युवा 'हर फिक्र को धुएं में उड़ाकर' चलने पर आमादा हैं। जिनकी प्राथमिकताएं तय नहीं हैं या जिनके पास करने को कुछ खास नहीं है वे पहले ओवरडोज लेंगे फिर 'वॉमेटिंग और डायरिया' के शिकार भी बनेंगे और सवाल उठाने पर अपने लिए कोई ना कोई तर्क भी ढूंढ लेंगे।

           इस संबंध में पत्रकारिता के छात्र अजय कुमार का कहना है कि विकासवाद के तमाम उपक्रमों की तरह सोशल मीडिया की वजह से भी फेक न्यूजअफवाहघृणापूर्ण टिप्पणी आदि कई समस्याएं उत्पन्न हुई है। सूचना को परमाणु बम से भी अधिक खतरनाक माना जाता है ऐसे में इन चुनौतियों से निपटने के लिए उपयोगकर्ताओं के क्रियाकलापों पर लगाम लगाना आवश्यक हो गया है। सोशल मीडिया एकाउंट को आधार कार्डपैन कार्ड जैसे दस्तावेजों से जोड़ने होंगेंसाथ ही लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी।
            मीडिया स्टूडेंट राजकुमार पाण्डेय बताते हैं कि सोशल मीडिया जो लोगों की आवाज उठाने और सूचना के सुगम माध्यमों का जरिया था, अब लोगों द्वारा नफरत भरी बातों और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर विभिन्न समुदायों में नफरत भरने का कार्य कियाजा रहा है।  अगर हम सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों की बात करें तो यह समाज में सुलभ मीडिया के रूप में लोगों की अच्छी पहुंच बना रहा था। पर मुझे लगता है जब से राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने प्रचार का जरिया बनाया तब से वहां पर उनके पार्टियों का प्रचार कम समुदायों में वैमनस्य की भावना को लगातार भड़काने का कार्य किया जा रहा है। और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स समाज के कुंठित लोगों के अलावा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी नफरत फैलाने से बाज नहीं आता है। हालिया घटना पर गौर करें तो दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम ने जिस तरह से फेसबुक पर मुस्लिमों की हिंसा को लेकर टिप्पणी की थी वह उनकी कुंठित और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच को प्रदर्शित करता है जो कि किसी भी जिम्मेदार पद पर अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहे व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जाती है।                                               मीडिया स्टूडेंट शशांक द्विवेदी का कहना है कि पत्रकारिता आज पत्रकारिता नहीं रह गई बल्कि चाटुकारिता ज्यादा बन गई है। कहने को तो हम चौथे स्तंभ है लेकिन आज के समय में पत्रकारों की मनोदशा देख कर आश्चर्य होता है। कहने  का तात्पर्य ये है कि जिस तरह बड़े पत्रकारों और ईमानदार पत्रकारों की छवि को आज कल के फर्जी पत्रकार ने धोया है वो कहीं न कहीं समाज के लिए हानिकारक है । मीडिया के प्लेटफॉर्म वक़्त के साथ बढ़ गए। सोशल मीडिया में हजारों की संख्या में पत्रकार हो गए है जो कि अपने कृत्य से कई अनुभवी पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं। मीडिया जगत में हम सरकार ही नहीं अपितु समाज के भी ताने सुनते हैं। पत्रकारों को न्यूज़ छापने और सच्चाई दिखाने की स्वतंत्रता होती है लेकिन आज के युग में न्यूज भी सरकार या बड़े आदमियों से पूछ कर छापा जाता है अपितु ये कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया बिक चुकी है।
                 पत्रकारिता के छात्र उमेश तिवारी का कहना है कि आज फेसबुकट्विटरलिंक्डइन इत्यादि प्लेटफार्मों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। शिक्षकोंप्रोफेसरों और छात्रों के बीच ये काफी लोकप्रिय हो गया है। एक छात्र के लिए सोशल मीडिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह उनके लिए जानकारी को साझा करनेजवाब प्राप्त करने और शिक्षकों से जुड़ने में सहायता करता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से छात्र और शिक्षक एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और इस प्लेटफॉर्म का अच्छा उपयोग करके जानकारी साझा कर सकते हैं। सोशल मीडिया के बिना हमारे जीवन की कल्पना करना मुश्किल हैपरन्तु इसके अत्यधिक उपयोग के वजह से हमे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती हैं। सोशल मीडिया समाज के विकास में अपना योगदान देता है और कई व्यवसायों को बढ़ाने में भी मदद करता है। सोशल मीडिया मार्केटिंग जैसे साधन प्रदान करता है जो लाखों सशक्त ग्राहकों तक पहुंचाता है। हम आसानी से सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी और समाचार प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी सामाजिक मुद्दे पर जागरूकता पैदा करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग एक अच्छा साधन है। इच्छुक नौकरी तलाशने वालों को भी इससे सहायता मिलती है। यह व्यक्तियों को बिना किसी हिचकिचाहट के दुनिया के साथ सामाजिक विकास और बातचीत करने में मदद कर सकता है। बहुत से लोग उच्च अधिकारियों के प्रोत्साहित भाषण को सुनने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। यह आपको लोगों से मेल-जोल बढ़ाने में भी मदद कर सकता है। सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग निद्रा को प्रभावित करता हैं। साइबर बुलिंगछवि खराब होना आदि जैसे कई अन्य नकारात्मक प्रभाव भी हैं। सोशल मीडिया की वजह से युवाओं में 'गुम हो जाने का भय' (एफओएमओ) अत्यधिक बढ़ गया है। सोशल मीडिया लोगों में निराशा और चिंता पैदा करने वाला एक कारक है। ये बच्चों में खराब मानसिक विकास का भी कारण बनते जा रहा है। सोशल मीडिया के कई नुकसान और भी हैं जैसे: साइबर बुलिंग ,हैकिंगव्यक्तिगत डेटा का नुकसान, (जो सुरक्षा समस्याओं का कारण बन सकता है) तथा आइडेंटिटी और बैंक विवरण चोरी जैसे अपराध और बुरी आदतें (सोशल मीडिया का लंबे समय तक उपयोगयुवाओं में इसके लत का कारण बन सकता है। बुरी आदतो के कारण महत्वपूर्ण चीजों जैसे अध्ययन आदि में ध्यान खोना हो सकता है)  सामाजिक और पारिवारिक जीवन का नुकसानरिश्ते में धोखाधड़ीहनीट्रैप्स और अश्लील एमएमएस सबसे ज्यादा ऑनलाइन धोखाधड़ी का कारण हैं। लोगो को इस तरह के झूठे प्रेम-प्रंसगो में फंसाकर धोखा दिया जाता है। सोशल मीडिया पर हमे उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की जॉच कर लेनी चाहिए क्योंकि सोशल मीडिया का आजकल हमारे जीवन में होने वाले सबसे हानिकारक प्रभावो में से एक माना जाने लगा हैऔर इसका गलत उपयोग करने से बुरा परिणाम सामने आ सकता है।
         पत्रकारिता के छात्र सुधाकर ओझा का कहना है कि सोशल मीडिया के उपयोग के फायदे तो बहुत है पर दुरुपयोग भी बहुत हो रहा है। एक घटना याद आ रही है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तबीयत बहुत खराब थी और वह हॉस्पिटल में एडमिट थे तो किसी के द्वारा एक अफवाह फैलाई गई की योगी आदित्यनाथ जी के पिता का देहांत हो चुका है अब वह खबर कई ग्रुपों में चली लेकिन जब मैंने उसकी पुष्टि की तो गलत थी, तब वह जीवित थे। इसके अलावा एक चीज और देखने को मिलती है कि लोगों द्वारा खासतौर एक दूसरे के धर्म और महिलाओं को लेकर जो बहुत ही गलत तरीके से टिप्पणियां की जाती हैं। कुछ लोग एक दूसरे के धर्म की मान्यताओं को गलत साबित करने में लगे रहते हैं। जिसको देखकर मन बहुत दुखी होता है और इस कारण समाज में कितना मतभेद फैला हुआ है आजकल एक नया ट्रेंड चला है सोशल मीडिया में किसी का प्रचार, किसी का दुष्प्रचार नेताओं या समर्थकों द्वारा किसी भी दूसरे नेता के फोटो-वीडियो को एडिट कर छवि धूमिल करने की कोशिश की जाती है लेकिन जब सच्चाई पता चलती है तो सोशल मीडिया से डर भी लगने लगता है। अभी कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक में किसी व्यक्ति द्वारा एक पोस्ट देखा जिसमें लिखा था मैं भारत को बर्बाद कर दूंगा और उसके नीचे प्रधानमंत्री की फोटो लगी थी यह देखकर बहुत ही बुरा लगा और मैंने उन महानुभव से अनुरोध किया कि इस प्रकार की पोस्ट तुरंत डिलीट कर दें।

Thursday, March 15, 2018

'बेमेल गठबंधन' की जीत, भाजपा की हार- अब आगे ?


   
आदित्य कुमार मिश्रा -गोरखपुर।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में सपा-बसपा के अघोषित गठजोड़ ने भारतीय जनता पार्टी को पराजित कर दिया है। इस परिणाम के पीछे सपा-बसपा के गठजोड़, गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारा जाना( ब्राम्हण-ठाकुर फैक्टर), योगी और मोदी के काम से जनता की नाराजगी जैसे अलग-अलग विश्लेषण समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों, वेबसाइटों और लोगों की जुबान पर आ रहे हैं।अगर गोरखपुर में योगी की पसंद का प्रत्याशी न उतारे जाने वाले तथ्य को सही माना जाए तो स्पष्ट है कि यह पराजय योगी और उनके नजदीकी समर्थकों के लिए अप्रत्याशित नहीं होगी, भाजपा भी इससे पूरी तरह परेशान नहीं होगी, लेकिन आम जनता और राजनीतिक विश्लेषक जिन्हें अंदरुनी ख़बर न हों उनके लिए यह परिणाम जरुर चौंकाने वाला दिख रहा है। विशेषकर गोरखपुर सीट का परिणाम, जहां से योगी आदित्यनाथ पिछले पांच बार लगातार जीत दर्ज कर चुके थे।

बात सपा-बसपा के 'अघोषित गठबंधन' की- 
यूं तो राजनीति में धर्म-जाति का बोल-बाला पूरे देश में देखने को मिलता है लेकिन यूपी-बिहार की राजनीति में धर्म और जाति सबसे असरदार फैक्टर के रुप में काम करता है। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि गोरखपुर के उपचुनाव में भी जातिवाद ने अहम भूमिका अदा की, जिसकी सूत्रधार रहीं बसपा प्रमुख मायावती। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट न जीत पाने, उ.प्र. विधानसभा चुनावों में महज 19 सीटों तक सीमित रहने और विपरीत परिस्थितियों में राज्यसभा से अपनी खुद की सदस्यता छोड़ने के बाद राजनीतिक रुप से काफी कमजोर स्थिति में दिख रही मायावती ने इस उपचुनाव को अवसर के रुप में लिया। गोरखपुर और फूलपुर दोनों ही सीटों पर अपना प्रत्याशी न खड़ा करके सपा प्रत्याशियों को बसपा का समर्थन दे दिया गया। जिसका परिणाम है कि योगी का अभेद किला 'गोरखपुर' ढह चुका है और प्रवीण निषाद के रुप में गोरखपुर की जनता को एक नया सांसद मिल चुका है और मायावती यूपी की राजनीति के केंद्र में आ गयी हैं। यूं तो राजनीतिक रुप से गोरखपुर हमेशा ही चर्चा में रहता है और योगी एवं उनके समर्थक हर बार लीड लिये रहते हैं लेकिन इस बार राष्ट्रीय राजनीति में गोरखपुर की चर्चा तो है लेकिन बढ़त विरोधियों के पास है। जीत अखिलेश के प्रत्याशियों की हुई है लेकिन जीत के केंद्र में मायावती हैं। भाजपा के खिलाफ गोरखपुर में मिली जीत से सपा, बसपा, कांग्रेस, राजद, वामपंथी दलों समेत एनडीए विरोधी लगभग सभी छोटे-बड़े दलों को संजीवनी मिल गयी है। गौरतलब है कि चुनाव परिणाम सामने आने पर अखिलेश यादव ने बसपा प्रमुख के घर जाकर उनसे मुलाकात की है। इस मुलाकात के दूरगामी परिणाम देखा जाए तो 2019 के आम चुनावों के लिए अखिलेश यादव को कांग्रेस के अलावा गठबंधन के लिए बसपा के रुप में एक मजबूत साथी मिल गया है। भाजपा द्वारा सपा-बसपा के इस गठबंधन को सांप-छूछूंदर का (असंभव) गठबंधन बताया जाता रहा है। लेकिन 14 मार्च 2018 को सपा-बसपा की इस जीत ने असंभव समझे जाने वाले इस गठबंधन की नींव डाल दी है। 2019 में अगर यह गठबंधन इस तरह का कोई भी उलटफेर करने में कामयाबी हासिल करेगा तो 2022 में भी यह प्रयोग जरुर दोहराया जाएगा....और उसके बाद आज का दिन (14 मार्च 18) योगी आदित्यनाथ और उनके समर्थकों के लिए न भूलने वाला दिन और कभी न भूलने वाली पराजय साबित होगा।

मायावती और अखिलेश की मुलाकात के मायने-
पहले मुश्किल समझे जाने वाले लेकिन अब व्यवहारिक दिख रहे सपा-बसपा के इस संभावित गठबंधन की संभावनाओं पर बात करें तो अखिलेश और मायावती को मिलकर तय करना होगा कि 2022 में दोनों में से किसके नेतृत्व में उ.प्र. विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। भले ही उपचुनाव में दो सीटें इन्हें मिल गयी हैं लेकिन 2019 में मोदी लहर से पार पाने के लिए इन दोनों में से किसी एक को 2022 की लड़ाई के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोह छोड़ना होगा जो कि दोनों के लिए दुष्कर है। यह भी हो सकता है कि दोनों ही दल मोदी से घबराए अन्य दलों को साथ लेकर अपनी-अपनी सुविधा से उ.प्र. की सीटें आपस में बराबर-बराबर बांटकर चुनाव लड़ें और सरकार बनाने लायक परिणाम आने पर सबसे बड़े दल का नेता सीएम की कुर्सी संभाले। वहीं दूसरा नेता केंद्र की राजनीति करे। इसके लिए कांग्रेस का साथ लेना जरुरी है। कांग्रेस के लिए भी सपा-बसपा का साथ पाना मुहंमांगी मुराद पाने जैसा है। कांग्रेस चाहें जितनी सिकुड़ती चली जा रही हो लेकिन प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी ही सबसे बड़े उम्मीदवार दिखाई देते हैं। राहुल को पीएम बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देकर माया-अखिलेश दोनों में से कोई एक (जो कि सीएम पद का मोह त्याग सका हो) समर्थन के बदले कांग्रेस से उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या किसी दूसरे बड़े पद की मांग सकता है।

सपा-बसपा गठजोड़ पर क्या करेगी भाजपा-
2014 से छोटे-मोटे पराजयों को छोड़कर ज्यादातर मौकों पर सफल दिख रही मोदी-शाह की जोड़ी सपा-बसपा को इतनी आसानी से उनके ख्वाब पूरा नहीं करने देगी। सपा-बसपा के चाल और इरादे अभी से ज़ाहिर होने लगे हैं लेकिन मोदी-शाह कौन सी चाल चलेंगे इसका अनुमान लगा पाना सपा-बसपा के लिए कठिन है। दूसरी तरफ अगर ये बात सच है कि "गोरखपुर में उपेन्द्र शुक्ल योगी की पसंद नहीं थे, उन्होंने खुद तो शुक्ल के समर्थन में प्रचार किया लेकिन हिन्दू युवा वाहिनी और अन्य असरदार कारक इस उप चुनाव में निष्क्रिय रहे और चुनाव परिणाम योगी की इच्छानुसार आया" तो भाजपा के लिए ये एक और चुनौती है। तमाम चुनावी विश्लेषणों को देखें तो लगता है मानों योगी ये बताना चाहते हैं कि गोरखपुर सीट जो कि पिछले 29 सालों से लगातार मठ के परिधि में थी आगे भी मठ के परिधि (योगी की इच्छा) में ही सुरक्षित है। बाहर का व्यक्ति चाहें वह भाजपा का पुराना से पुराना कार्यकर्ता या पदाधिकारी ही क्यों न हो, वह गोरखपुर संसदीय सीट के लिए जिताऊ नहीं है। एैसी स्थिति में एक तरफ भाजपा नेतृत्व को सपा-बसपा से गठजोड़ से मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ मोदी के उत्तराधिकारी समझे जा रहे योगी से भी पार पाना होगा। 2022 का चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। गोरखपुर में मोदी-शाह की जोड़ी योगी के सामने झुकने की बजाय यहां चुनाव का मोर्चा खुद हाथ में ले सकती है। 2022 जो कि स्वंय मोदी के कार्यों और वर्चस्व की परीक्षा होगी उसमें मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। मोदी के चेहरे के आगे बड़े से बड़ी बाधा दूर हो सकती है। योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी देते समय उन्होंने हर परिस्थिति का अनुमान लगाया होगा। वर्तमान परिस्थिति के लिए भी उनके पास कोई न कोई चौंकाने वाली चाल जरुर होगी। फिलहाल सपा-बसपा का गठजोड़ विपक्षी एकता में जान फूंक चुका है। विपक्षी दल अगर आपसी स्वार्थ को त्यागकर मोदी का विकल्प तलाशने का प्रयास करेंगे तो मोदी के लिए 2019 का मुकाबला आसान नहीं होने जा रहा है। योगी आदित्यनाथ भी इस बात से वाकिब होंगे कि 2019 का चुनाव अगर हाथ से निकल गया तो 2022 में दुबारा सीएम की कुर्सी हासिल कर पाना उनके लिए भी मुश्किल होगा। अखबारों-चैनलों और न्यूज वेबसाइट्स की माने तो फिलहाल योगी अपनी ताकत दिखा चुके हैं। अब मोदी-शाह की बारी है। इस बार योगी को मोदी-शाह का साथ देना होगा तभी 2022 उनके लिए सुलभ होगा।

Sunday, February 15, 2015

जातिवाद बनाम शिक्षा

जाति और धर्म हमारे देश में लोगों की पहचान से जुड़ा मुद्दा है। पहले समाज में इस तरह के जुमले खुलेआम प्रयोग किये जाते थे कि अमुक व्यक्ति उच्च जाति का है, अमुक निम्न जाति का है। अमुक जाति के व्यक्ति को यह काम नहीं करना चाहिए या अमुक जाति का होकर भी अमुक व्यक्ति यह काम करता है। कुल मिलाकर आजादी के पूर्व जातिवाद अपने विभत्स रुप में था। आजादी के बाद स्थिति बिल्कुल सुधर गई हो ऐसा नहीं कहा जा सकता, फिर भी हम देखते हैं कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार और संविधान से मिले समानता के अधिकार की वजह से लोगों में कुछ जागरुकता आई है।  
     छूआछूत के खिलाफ गांधी जी के प्रयत्नों और अम्बेडकर जी कार्यों की आज भी सराहना होती है। हमारे महापुरुषों के योगदान हमें जात-पात का भेद भुलाकर एक होने की प्रेरणा देते हैं फिर भी समाज में जातिवाद की समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही है? इस विषय पर विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि हमारे समाज से जातिवाद के खत्म न होने के पीछे बहुत हद तक हमारे देश का राजनैतिक और जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त बौद्धिक (लेखक) वर्ग जिम्मेदार है। हमारे देश में कई राजनीतिक दल जातियों के आधार पर टिके हैं। किसी पर अगड़ी जातियों की पार्टी होने का नाम चस्पा है तो, कोई पिछड़े वर्ग का नेता कहलाता है, कोई दलितों का मसीहा बनता फिरता है तो कोई अगड़ा-पिछड़ा समीकरण बनाकर अपनी राजनैतिक नैया खेता नजर आता है। हालांकि प्रत्येक राजनीतिक दल समाज के सभी वर्गों का वोट हासिल करना चाहता है फिर भी जाति विशेष के नेतृत्व और उसी पर सर्वाधिक भरोसे की वजह से कोई न कोई विशेष राजनीतिक दल समय-समय पर कोई न कोई ऐसा बयान या नीति जारी कर ही देता है जिससे उसके विरोधी विचारों वाले दल भड़क जाते हैं और उनके समर्थक सड़कों पर उतर आते हैं। एक दल के समर्थकों के प्रतिउत्तर में दूसरे दल के समर्थक भी मैदान में उतरने से गुरेज नहीं करते। परस्पर विरोधी बयानों और आंदोलनों की वजह से जातिवाद की खाई पहले की अपेक्षा और चौड़ी हो जाती है। फेसबुक-ट्विटर और ब्लॉग जैसे सामाजिक माध्यमों के दुरुपयोग से यह खाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही। अपनी जाति के नेता के बयान या चुनावी जीत-हार पर उसके समर्थक इन माध्यमों पर कठोर शब्दों में विरोधियों पर हमला बोलते हैं और अपनी खुशी का इजहार करते नज़र आते हैं। बदले में विरोधी खेमे के समर्थक भी नफरत फैलाने वाले शब्दों और जुमलों के साथ उसी अंदाज में जवाब देते हैं। जातिवाद की खाई को फैलाने का ये युद्ध सामाजिक माध्यमों पर तब तक चलता रहता है जब तक कोई नया मुद्दा न आ जाए।
            शिक्षित युवाओं में जातिवाद को लेकर एक दूसरे से नफरत करना बहुत ही गंभीर समस्या है। प्रायः हमारे युवा एक दूसरे की सफलता-असफलता पर सच्चे मन से साथ रहते हैं। जीत पर बधाई और हार पर दिलासा देना हमारी परंपरा रही है। कोई भी छात्र अपनी कक्षा में प्रथम आता है या कोई भी खिलाड़ी क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाता है, फुटबाल में सर्वाधिक गोल करता है या अन्य किसी भी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करता है तो उसके प्रदर्शन के आधार पर उसकी तारीफ होती है। इस बीच आज समाज में लेखकों का एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो जातियों के आधार पर प्रदर्शन को आंकने लगा है और उसी आधार पर वह तारीफों के पुल बांधता है। ऐसे लेखक किताबों, समाचार पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त सामाजिक माध्यमों की सहायता से अपने जाति आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करने लगे हैं। सामाजिक माध्यमों पर ऐसे विचारों का प्रचार-प्रसार और प्रतिक्रियाएं बड़ी ही तेजी से हो रही हैं। जिसका दुष्परिणाम जाति के आधार पर एक-दूसरे से नफरत करने, एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार न होने के रुप में आ रही है। कुछ लेखक जातिवादी मानसिकता से ग्रसित होकर मीडिया, खेल, सिनेमा, शिक्षा, रोजगार आदि क्षेत्रों में जाति विशेष के लोगों की संख्या और स्थिति का आंकलन करते हैं और उसका विश्लेषण नमक-मिर्च लगाकर नफरत फैलाने वाले शब्दों में करते हैं। महापुरुषों तक को ये लोग जातियों के आधार पर बांट लेते हैं। एक जाति के महापुरुष या प्रतीक को, दूसरे जाति के महापुरुष या प्रतीक के दुश्मन के रुप में दिखाया जाता है। जिन्हें अपने लेखों और सुविचारों का प्रचार प्रसार दूर-दराज के गांवों में जागरुकता फैलाने के लिए करना चाहिए वे लोग स्कूल-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षित लड़के-लड़कियों को साजिश के तहत अपना कुत्सित बौद्धिक ज्ञान देते हैं। इनके द्वारा नफरत फैलाने वाले साहित्य बांटे जाते हैं। ये खुद को इन विद्यार्थियों का मार्गदर्शक बना लेते हैं और दूसरे जाति के लोगों द्वारा किसी समय विशेष पर किये गये किसी प्रकार के अत्याचार को सार्वभौमिक सत्य बताकर दूसरे जाति के खिलाफ इन्हें भड़काते हैं और इनके नैसर्गिक विकास में बाधा बन जाते हैं। प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि दूसरों को ज्ञान देने वाले नेता और सामाजिक चिंतक अपना नीजि फायदा देखते ही विरोधी खेमे के शीर्ष नेतृत्व से हाथ मिला लेते हैं और उनके समर्थक खुद को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। ऐसे में समाज के शिक्षित युवाओं की यह जिम्मेदारी है कि शिक्षा का यथासंभव प्रचार-प्रसार करें और नफरत फैलाने वाले लोगों को अपना मार्गदर्शक या हितैशी कदापि न समझें। लोगों का जाति-धर्म की बजाय उनके कार्य एवं व्यवहार के आधार पर आंकलन करें और उनसे सम्पर्क बनाए। जातिवाद की खाई को चौड़ा होने से रोकने के लिए प्रतिक्रियावादी होने की बजाय संयम से काम लेना होगा और ऐसे नेता, लेखक या मार्गदर्शक को समर्थन देने से गुरेज करना होगा जो एकतरफा ज्ञान देते हों। इस बात का ध्यान तो सदैव रखना होगा कि अच्छा व्यक्ति कभी दूसरों से नफरत करने या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं करता। जो व्यक्ति या संस्था ऐसा करे उनसे दूर रहना होगा। इस संबंध में मीडिया और कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।   

Thursday, January 8, 2015

मोबाइल है मगर शौचालय नहीं.


 
 गंदगी से बीमारी फैलती है। जगह-जह फैला कचरा और खुले में शौच बीमारी को बुलावा देने जैसा है, ये जानने के बावजूद भारत में गंदगी की समस्या एक आम बात है। लोग अपना घर-द्वार तो साफ ऱखना जानते हैं लेकिन यही लोग सड़कों पर कूड़ा-कचरा फेंकने से बाज नहीं आते।  रेलवे स्टेशनों, बस स्टेशनों, रेल की पटरियों पर आम लोग निसंकोच केले का छिलका, बिस्कुट-नमकीन के पैकेट, खाने के पैकेट, पानी और कोल्डड्रिंक्स के बॉटल आदि फेंक देते हैं। कई बार सार्वजनिक स्थानों पर सफाई से संबंधित दिशा निर्देश या प्रेरक संदेश लिखे रहते हैं जैसे 'आप जो गंदगी फैला रहे हैं, उसे आप जैसा ही कोई इंसान साफ करता है।' इसके बावजूद लोग गंदगी फैलाने से नहीं चूकते। आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों, ट्रेनों आदि में उपलब्ध शौचालयों के उपयोग में भी लोग सावधानी नहीं बरतते और अपना काम निपटाकर दूसरों के लिए समस्या छोड़ जाते हैं। सार्वजनिक शौचालय में गंदगी की समस्या में, सफाईकर्मियों की संख्या में कमी या उनकी लापरवाही के अतिरिक्त जनता की गलत आदतों का योगदान भी रहता है। लोग ट्रेन के शौचालयों में पर्याप्त पानी नहीं डालते या डालते भी हैं तो इधर-उधर पानी फैला देते हैं जिससे उनके बाद के व्यक्तियों के लिए समस्या खड़ी हो जाती है।
                          व्यक्तिगत स्तर पर गांवों में लोगों के घरों में शौचालयों का न होना एक बड़ी समस्या का रुप ग्रहण कर चुका है। आश्चर्य की बात है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों के घरों में टेलीविजन और डीटीएच के कनेक्शन मौजूद हैं। एक घर में दो-दो, तीन-तीन मोबाइल या परिवार के अधिकांश सदस्यों के हाथ में मोबाइल है। इनमें से कुछ लोग मोबाइल पर इंटरनेट के प्रयोगर्ता हैं। इस प्रकार के लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है लेकिन इनमें से अधिकांश के घरों में शौचालय नहीं है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की मासिक पत्रिका कुरुक्षेत्र के दिसंबर 2014 के अंक मुताबिक वर्ष 2011 में ग्रामीण क्षेत्रों के आधे से ज्यादा घरों में मोबाइल अथवा टेलिफोन थे जबकि इसकी तुलना में सिर्फ एक तिहाई घरों में ही शौचालय बने थे। केंद्र सरकार के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों की सरकारें लोगों के घरों में शौचालय निर्माण के लिए कार्य करती आई हैं लेकिन इतनी विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां की अधिकांश जनता गांवों में ही निवास करती है, प्रत्येक घऱ में शौचालय निर्माण करा पाना सरकारों के लिए बहुत कठिन कार्य है। सरकारों द्वारा कागजों में सभी के घरों में शौचालय के निर्माण हो सकते हैं लेकिन हकीकत में सभी के घरों में शौचालय का निर्माण लोगों की व्यक्तिगत पहल के बगैर संभव नहीं है।
                          केंद्र सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को खुद हाथ में झाड़ू लेकर दिल्ली के वाल्मिकी बस्ती में सफाई करके 'स्वच्छ भारत अभियान' की शुरुआत क'स्वच्छ भारत अभियान'के एक भाग के रुप में प्रत्येक पारिवारिक इकाई के अंतर्गत घरेलू शौचालय की इकाई लागत को 10000 से बढ़ाकर 12000 रुपये कर दिया गया है और इसमें हाथ धोने, शौचालय की सफाई एवं भंडारण को भी शामिल किया गया है। इस तरह के शौचलय के लिए सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायता 9000  और इसमें राज्य सरकार का योगदान 3000 रुपये होगा। जम्मू एवं कश्मीर एवं उत्तरपूर्व राज्यों एवं विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलने वाली सहायता 10800 रुपये होगी जिसमें राज्य का योगदान 1200 रुपये होगा। अन्य स्रोतों से अतिरिक्त योगदान करने की स्वीकार्यता होगी।
                  जो लोग मोबाइल खरीद सकते हैं, डीटीएच के कनेक्शन ले सकते हैं, मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं उनके घरों में शौचालय का न होना उनकी लापरवाही को ही दर्शाता है। ऐसे लोगों को न सिर्फ अपने घरों पर अपने खर्चे पर शौचालय का निर्माण कराना चाहिए बल्कि अपने आस-पास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए। ग्रामीण तबके के पढ़े-लिखे लोग सरकार द्वारा मिल रहे सहायता राशि की जानकारी आमलोगों तक पहुंचा सकते हैं। सरकारी योजना का लाभ सामान्य ग्रामीण ले सकें इसके लिए ग्राम-प्रधान व संबंधित इकाई से संपर्क कर प्रत्येक घर में शौचालय का निर्माण सुनिश्चित कराया जा सकता है।ग्रामीण क्षेत्रों में शौच जाते समय किसी युवती या महिला के साथ बलात्कार या बलात्कार की कोशिश की खबरें हमें आए दिन समाचार पत्रों में देखने को मिल जाती हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक घर में शौचालय के निर्माण हो जाने से लोगोंको न सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभ होगा बल्कि युवतियों और महिलाओं के साथ शौच जाते समय होने वाली छेड़खानी और बलात्कार की घटनाएं रोकी जा सकती हैं।

Tuesday, January 6, 2015

BOSS इज ऑलवेज राइट

BOSS तो BOSS होता है,
मक्खन उसे बहुत पसंद होता है..
खुद गलतियों पर गलतियां करता है,
बड़ी-बड़ी गलतियां करता है..
लेकिन दूसरों की छोटी से छोटी गलती,
BOSS को बर्दाश्त नहीं होती..
दूर मत जाइये, मेरे छोटे BOSS को देखिये,
7 दिन में कम से कम 14 गलती तो कर ही देता है..
और अपनी गलती पर हंसता भी खूब है,
लेकिन अगर मैं 14 दिन में एक भी गलती कर दूं तो
छोटा BOSS, छोटा राजन बन जाता है..
जोर-जोर से चिल्लाता है, उल्टे- सीधे आरोप लगाता है,
फिर बड़े BOSS के गुफा में चला जाता है..
फिर शुरू हो जाती है, चम्मच और मक्खन की कहानी,
लड़का बिगड़ गया है BOSS, काम में इसका मन ही नहीं लगता..
ये है - वो है, ऐसा है – वैसा है,
चल नहीं पायेगा BOSS, ऐसे चल नहीं पायेगा..
फिर बड़ा BOSS अपने गुफा रूपी केबिन से निकलता है,
बड़ा BOSS हालांकि समझदार होता है..
लेकिन छोटे BOSS का मक्खन उसके सिर चढ़कर बोलने लगता है,
तौम... तौम ऐसा करते हो, तौम... तौम वैसा करते हो..
तौमको... तौमको तो मैं अच्छा लड़का समझता था,
तौम भी औरों की तरह बन रहे हो..
दैखो... दैखो चल नहीं पाएगा, ऐसे चल नहीं पाएगा,
मुझे समझ में नहीं आता कि किधर देखूं..
चारों तरफ क्वैश्चन मार्क ही क्वैश्चन मार्क नज़र आते हैं,
नौकरी हाथ से गई सी दिखती है..
तभी अचानक BOSS के रंग बदल जाते हैं,
बोलता है मन लगाकर काम करो
दुबारा मैं तुम्हारी शिकायत सुनना नहीं चाहता..   
BOSS की अंतिम बात सुनते ही नौकरी बच जाती है
और मुंह से अपने आप निकलता है,
BOSS इज ऑलवेज राइट।

Sunday, August 15, 2010

मेरा गोरखपुर शहर

जहाँ  बाबा राघव   मेडिकल कॉलेज    है
जहाँ    दीनदयाल    विश्वविद्यालय है।
जहाँ   गोरख   बाबा     का     मंदिर    है.
जो    सबके     दिलों     के    अंदर     है।
जो    कबीर     प्रेम     कि     धरती     है 
जहाँ       बुढ़िया      माई     रहती     है।
जहाँ  जनता  गोरखनाथ  की  पुजारी  है.
जहाँ  से   हारा    मनोज     तिवारी    है।
जहाँ    धर्म-संस्कृति     का    राज़     है.
जिस पर  सदा  ही  हमको  को  नाज़  है।  
जहाँ      विकास       की       लहर      है.
वहीँ      मेरा     गोरखपुर      शहर    है।



गोरखपुर विश्वविद्यालय