Thursday, May 14, 2020

प्रबंधन विज्ञान विभाग ने ऑनलाइन कराया पूर्व छात्र सम्मेलन


*पूर्व विद्यार्थियों ने विभागाध्यक्ष समेत विभाग के शिक्षकों को दिया सफलता का श्रेय*

*कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने पूर्व विद्यार्थियों की राय को केविवि के लिए बताया उपयोगी*

*प्रो. पवनेश कुमार, प्रो.सुधीर कुमार साहू, डॉ. सपना सुगंधा,डॉ.अल्का लल्हाल व कमलेश कुमार आदि शिक्षकों समेत बड़ी संख्या में पूर्व विद्यार्थियों ने की सहभागिता*

(13 मई 2020)
पढ़ाई के दौरान हमें हमारे शिक्षकों का पूरा साथ मिला। हमारे शिक्षक व्यक्तिगततौर पर एक-एक विद्यार्थी की कमजोरियों और ताकत पर ध्यान दिलाते थे। हमें एमबीए की पढ़ाई के दौरान कोर्स के अलावा पर्सनॉलिटी डेवलपमेंट की ओर ध्यान दिलाया गया। कैम्पस प्लेसमेंट से पहले तैयारी का समय हमारे लिए सीखने का बेहतरीन मौका होता था। मुझे याद है जब कैम्पस प्लेसमेंट में बापूधाम मिल्क प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड में मेरा चयन नहीं हुआ तो मैं बहुत नर्वस थी। मेरे विभागाध्यक्ष मुझसे कहते थे कि तुम चिंता मत करो, आगे की तैयारी करो। तुम्हें इससे भी अच्छी जगह नौकरी मिलेगी। आगे चलकर ये बात बिल्कुल सही साबित हुई। कुछ ही समय बाद मेरे पास एक साथ 4 नौकरियों का ऑफर था। बताते हुए खुशी हो रही है कि आज मैं छत्तीसगढ़ के भिलाई में स्टील अथॉरिटी इंडिया लिमिटेड में काम कर रही हूं। मेरी इस सफलता का श्रेय मेरे शिक्षकों व केविवि को जाता है। ये बातें महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित ऑनलाइन पूर्व छात्र सम्मेलन के दौरान सत्र 2017-19 की पूर्व छात्रा सुष्मिता पाटला ने कही।

इससे पूर्व विवि के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में इस आयोजन पर प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष एवं शिक्षकों की प्रशंसा की। प्रो. शर्मा ने कहा कि पूर्व विद्यार्थियों की राय किसी भी विश्वविद्यालय के विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है। प्रबंधन विभाग के पूर्व विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने भविष्य में भी इस तरह के संवाद कार्यक्रम आयोजित करने की बात कही।                                                                                                                                                                             

2017-19 बैच की पूर्व छात्रा मनीषा कुमारी ने कहा कि मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि केविवि के प्रबंधन विज्ञान विभाग में पढ़ने का अवसर मिला। इससे पूर्व मैंने जहां से स्नातक किया था वहां विद्यार्थियों और अध्यापकों के बीच एक गैप रहता था। जबकि यहां शिक्षकों से हम सभी का भरपूर इंट्रैक्शन हुआ। पढ़ाई के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास का अवसर मिला। मेरी कम्युनिकेशन स्किल अच्छी हो गयी। मैंने यूजीसी-जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और वर्तमान में मैं सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही हूं। मैं जो कुछ भी कर पा रही हूं उसका श्रेय मेरे शिक्षकों को जाता है। उम्मीद है कि मैं सिविल सेवा की परीक्षा में सफलता हासिल कर आप सभी को गर्व का अवसर दूंगी।
अप्पू कुमार नाम के पूर्व छात्र ने कहा कि एमबीए की पढ़ाई के दौरान हमें सैद्धांतिक के साथ-साथ जो व्यवहारिक ज्ञान हासिल हुआ वह हमारे लिए बहुत ही लाभदायक साबित हुआ। मैंने जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्तमान में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहा हूं। अपने जूनियर साथियों से कहना चाहूंगा कि टेक्नॉलॉजी से रिलेटेड करिकुलम एक्टिविटी करें। शिक्षकों को भरपूर सम्मान देते हुए उनके निर्देशों का पालन करें। सफलता आपके कदम चुमेगी।

अनु कुमारी ने कहा कि केविवि के प्रबंधन विज्ञान विभाग से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। आज मैं राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड में मैनेजमेंट ट्रेनी पद पर कार्यरत हूं। अच्छी ट्रेनिंग के लिए मैं अपने विभागाध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार समेत सभी शिक्षकों का धन्यवाद देती हूं।
2016-18 बैच के न्यूटन ने कहा कि प्रबंधन विज्ञान विभाग में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने समस्ता कंपनी में काम किया। उसके बाद मेरा रुझान थोड़ा बदला और मैं आईबीपीएस द्वारा आयोजित परीक्षाओं में शामिल हुआ। इसके अलावा भी मैंने कुछ अन्य सरकारी नौकरी के लिए प्रयास किया। परिणाम का इंतजार कर रहा हूं। उम्मीद है कि मैं सफलता हासिल करुंगा। जूनियर साथियों से कहूंगा कि लगन के साथ शिक्षकों के मार्गदर्शन के अनुसार अपनी पढ़ाई और भविष्य की तैयारी करें। नकारात्मक सोच वालों से दूर रहें।
सूरज आनंद ने बताया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फ्लिप कार्ट कम्पनी में काम किया। वहां अच्छा अनुभव मिला, उसके बाद खुद का बिजनेस शुरु किया। पढ़ाई के दौरान शिक्षकों ने सीखाया कि जो करना है अभी तय कर लो, बाद में पछताना मत। मुझे खुशी है कि शिक्षकों की बात मेरे काम आई। मैं आज आत्मनिर्भर हूं। मैं आप सभी से कहूंगा कि केवल जॉब के भरोसे मत बैठिये। खुद का बिजनेश शुरु किजिये, आत्मनिर्भर बनिये।
श्याम मनोहर मिश्र ने बताया कि पढ़ाई के दौरान हमें बहुत बढ़ियां ट्रेनिंग मिली। मैं वर्तमान में यूनियन बैंक में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत हूं। लॉकडाउन के दौरान मुझे अपने बैंक में मुझे सोशल डिस्टेंसिंग इंचार्ज बनाया गया है। यह हमारी ट्रेनिंग की ही देन है कि कठिन परिस्थिति में भी मैं बेहतर ढंग से काम कर पा रहा हूं। जूनियर साथियों से कहना चाहूंगा कि खूब मेहनत कीजिये। जहां भी इंटर्न का मौका मिले, जी-जान से काम कीजिये। काम से भागिये मत वर्ना एक दिन काम आपसे दूर हो जाएगा।
सोनम ने बताया कि शुरु में वह एक सामान्य विद्यार्थी थीं। एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन आया। वर्तमान में वह एसआईएस, पटना में एचआर एक्जिक्यूटिव के पद पर काम कर रही हैं। अगर केविवि के प्रबंधन विभाग में पढ़ने का अवसर न मिलता तो यह कर पाना उनके लिए संभव नहीं था। पटना में अपने परिवार से दूर रहकर भी सफलतापूर्वक व अपनी ड्यूटी को निभा रही हैं। इसका श्रेय उन्होंने केविवि के प्रबंधन विभाग को दिया और इसके लिए अपने सभी शिक्षकों का आभार जताया।
मिहिर मनोहर ने बताया कि वह केविवि से एमबीए करने के बाद इसी विवि में यूडीसी के पद पर काम कर रहे हैं। ज्वाइनिंग के समय उन्हें उनके विभागाध्यक्ष ने कुछ कड़वी सीख दी थी, जिसे उन्होंने सकारात्मक ढंग से लिया और बहुत जल्द यूजीसी की जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया। जूनियर साथियों से उन्होंने कहा कि शिक्षकों के डांट का कभी बुरा नहीं मानना चाहिए।  2017-19 बैच की मेघा सिन्हा ने कहा कि केविवि के प्रबंधन विज्ञान विभाग से पढ़ाई पूरी करना सौभाग्य की बात है। एमबीए के अंतिम सेमेस्टर में बापूधाम मिल्क प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड में नौकरी करने के दौरान उनका कुछ समय वहां निकल गया। वह सोचती हैं कि काश वह समय उन्हें मिल जाता। सभी शिक्षक बच्चों को व्यक्तिगत तौर पर ध्यान देते हैं। अच्छी ट्रेनिंग के लिए सभी शिक्षकों का उन्होंने आभार जताया।

इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.पवनेश कुमार ने सभी विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दी। उन्होंने वर्ष में दो बार इस तरह के आयोजन कराने का बात कही। उन्होंने विवि के कुलपति प्रो.शर्मा का आभार जताते हुए कहा कि विद्यार्थियों की हौसलाफजाई के लिए वे बड़ी ही सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं। अन्य विवि में कुलपति से मिलना आसान नहीं होता। सभी विद्यार्थियों से उन्होंने कहा कि खुशी की बात है कि एमबीए में दी गई ट्रेनिंग आपके काम आ रही है। आप जहां भी हैं उसे शुरुआत मानिये, इसे बहुत बड़ा अचीवमेंट मानकर रुक मत जाइये। एक आईपीएस व आईएफएस अधिकारी का उदाहरण देते हुए बताया कि सफलता के लिए जूनून का होना जरुरी है। जूनून की कमी से ही कई बार हम सफलता के करीब पहुंचकर भी उसका स्वाद चखने से चूक जाते हैं।
प्रबंधन विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ.अल्का लल्हान ने कार्यक्रम का संचालन किया और बीच-बीच में कई रोचक अनुभवों को साझा किया। प्रो. सुधीर कुमार साहू, सह प्रोफेसर डॉ.सपना सुगंधा, डॉ. स्वाति कुमारी, कमलेश कुमार, प्रो. विकास पारीक, आदि शिक्षकों व पूर्व में विभाग में कार्यरत डॉ. अभिजीत विश्वास, डॉ.आदित्य कुमार मिश्रा समेत बड़ी संख्या में पूर्व व वर्तमान विद्यार्थी ऑनलाइन उपस्थित रहे।

सूचना प्रदाता ही नहीं, चरित्र निर्माता भी हैं शिक्षक


‘ई-लर्निंगः चुनौतियां एवं अवसर’ विषय पर वेबिनार में विशेषज्ञों ने रखे विचार

*प्रो.आलोक कुमार चक्रवाल, प्रो.डी.बी. सिंह, प्रो.बिजय भुजबल व प्रो.रिपुदमन गौर ने दिया व्याख्यान*

*केविवि कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा रहे संरक्षक, प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने की अध्यक्षता*
(12 मई 2020)
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मंगलवार को ‘ई-लर्निंगः चुनौतियां एवं अवसर’ विषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया। सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, गुजरात के वाणिज्य एवं व्यापार प्रबंधन विभाग के प्रो.आलोक कुमार चक्रवाल ने प्रथम विशेषज्ञ के तौर पर अपने संबोधन में कहा कि निश्चित तौर पर यह समय चुनौती भरा है लेकिन यह हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर भी है। भारत के संदर्भ में कहा कि सूचना एवं संचार क्रांति के इस दौर में सीखने और सीखाने की स्थिति बहुत अच्छी है। हम भारतीय बहुत तेजी से सीखने की क्षमता रखते हैं। कुछ तकनीकी समस्याएं जरुर सामने आती हैं। कुछ स्थानों पर बिजली की समस्या रहती है इसके बावजूद हम बहुत तेजी से आगे बढ़ने जा रहे हैं। ई-लर्निंग का भविष्य बहुत उज्जवल है। पिछले 50 दिनों में हमने देखा कि किस तरह हम ऑनलाइन लर्निंग के अभ्यास कर रहे हैं और सफल हो रहे हैं। विद्यार्थियों को ई-लर्निंग के लिए उत्साह बनाए रखने के लिए कहा कि शिक्षकों को बेस्ट स्टडी मैटेरियल उपलब्ध कराना होगा। पूरी एनर्जी के साथ उनसे जुड़ना पड़ेगा और अपने आउटडेटेड नॉलेज से बाहर आना पड़ेगा।

इससे पूर्व वेबिनार के संरक्षक, विवि के कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि लॉकडाउन जैसी व्यवस्था में जो कुछ भी नया-सृजनात्मक किया जा सकता है केविवि में किया जा रहा है। वेबिनार का महत्व बताते हुए कहा कि यह किसी एक विषय से संबंधित नहीं है बल्कि उच्च शिक्षा के सभी आयामों से संबंधित है। उन्होंने आह्वाहन किया कि उच्च शिक्षा में विद्वानों को ई-माध्यमों से जोड़कर, उनके विचारों को और अधिक फैलाएं, जिससे चर्चा आगे बढ़े। वेबिनार में 150 से ज्यादा लोगों के जुड़ने पर प्रसन्नता जताते हुए वेबिनार के संयोजक व प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार व विभाग के सभी शिक्षकों की सराहना की। आगे कहा कि वर्तमान परिस्थिति में विवि के शिक्षकों ने सकारात्मक और सार्थक मार्ग चुनने का काम किया है।

वहीं राजर्षि प्रबंध एवं तकनीकी संस्थान, वाराणसी के निदेशक प्रो.डी.बी. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में हम जो कुछ कर रहे हैं यह हमारी प्रतिक्रिया है। हम ई-लर्निंग की तरफ जा रहे हैं यह च्वाइस का मामला नहीं है। समय के अनुसार हमें अपने माइंडसेट को चेंज करने की आवश्यकता है। ई-लर्निंग के बारे में कहा कि लॉकडाउन से पहले भी ई-लर्निंग का महत्व था, लॉकडाउन के दौरान भी इसका महत्व है और बाद में भी ऑनलाइन लर्निंग का महत्व रहेगा। आगे कहा कि ई-लर्निंग को सफल बनाने में अनुशासन का होना जरुरी है। उसके बिना यह प्रणाली सार्थक नहीं है।

सेंचुरियन तकनीकी एवं प्रबंधन विश्वविद्यालय, उड़ीसा के प्रबंधन संस्थान के निदेशक प्रो. बिजय भुजबल ने ई-लर्निंग को समय की मांग बताते हुए कहा कि आज अध्ययन-अध्यापन के लिए कई ऐप हैं। ई-लर्निंग का अधिकतम लाभ लेने के लिए शिक्षकों को अभिनव प्रयोग करने होंगे और बच्चों को इंगेज रखना होगा। बच्चे अलग-अलग भौगोलिक परिवेश से आते हैं। सबकी क्षमता एवं रुचि को समझकर ही अध्यापन किया जा सकता है। उन्होंने टीचिंग को एक्टिंग की तरह बताते हुए अध्यापकों से अपने पेशे में परफारमेंस देने की बात कही।

वहीं जीएल बजाज प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, ग्रेडर नोएडा के प्रो.रिपुदमन गौर ने अपने वक्तव्य में कहा कि एक समय था जब मोबाइल को विवि में बंद किये जाते थे और आज ऐसा समय आ गया है कि मोबाइल से ही विवि चल रहे हैं। इस तकनीकी से तालमेल बैठाना होगा। जिस तरह से हम तेजी से ई-लर्निंग की तरफ शिफ्ट हुए हैं, उसी तरह हमें बच्चों को दिये जा रहे स्टडी मैटेरियल को भी समयानुकुल करना होगा। आगे कहा कि टीचर केवल इनफार्मेशन प्रोवाइड नहीं करता, चरित्र भी निर्माण करता है। अध्यापकों की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा है। जब आप ई लर्निंग की तरफ जा रहे हैं तो इंटरैक्शन का तरीका विकसित करना होगा। आपको लर्नर के समझने का तरीका व क्षमता मालूम होना चाहिए। अध्यापक टीवी की तरह नहीं बोल सकते। हमें 50 मिनट लेक्चर देने की आदत बनी हुई है। स्टूडेंट के व्यवहार एवं आवश्यकता को देखते हुए इसे मिनिमाइज करना पडेगा। 50 मिनट से हमें लेक्चर का पीरियड 30 मिनट करना होगा। अध्यापकों को अपने कम्फोर्ट जोन से बाहर आकर बच्चों की उनकी रुचि के अनुसार इंगेज करना होगा। तभी हम ई-लर्निंग का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं।

वेबिनार के अध्यक्ष व प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने कहा कि बहुत ही खुशी की बात है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों व विवि से 150 से ज्यादा लोग सहभागिता कर रहे हैं। सभी व्याख्याता अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। इनके वक्तव्यों से शिक्षकों व विद्यार्थियों दोनों को बहुत लाभ मिलेगा।  वेबिनार की संयोजक सह-प्रोफेसर सपना सुगंधा ने कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं सहायक प्रोफेसर डॉ. स्वाति कुमारी ने सभी व्याख्याताओं व सहभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस वेबिनार में केविवि के प्रो.राजीव कुमार, प्रो. अजय कुमार गुप्ता, प्रो. सुधीर कुमार साहू, डॉ. दिनेश व्यास, कमलेश कुमार व माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के डॉ.आदित्य कुमार मिश्रा समेत बड़ी संख्या में शिक्षकों व विद्यार्थियों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

डेयरी व कृषि जगत के विशेषज्ञों ने केविवि के साथ वेबिनार में किया मंथन


*कहा-डेयरी और कृषि उद्योग ने रखी देश की इज्जत*

*‘कोरोना संकट, कृषि एवं डेयरी: मुद्दे, अवसर और चुनौती’ विषय पर हुई चर्चा*

*केविवि कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने की अध्यक्षता, प्रो. पवनेश कुमार रहे संयोजक*

*एनडीडीबी डेयरी सर्विसेज, नई दिल्ली, झारखंड स्टेट मिल्क फेडरेशन लिमिटेड, रांची, सुमुल डेयरी, सूरत, बापूधाम मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, मोतिहारी, वेरका मिल्क प्लांट, होशियारपुर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी, आईएआरआई, पूसा, नई दिल्ली से जुड़े दिग्गजों ने दर्ज कराई  मौजूदगी*

(9 मई 2020)
कोरोना संकट के कारण अधिकांश उद्योग-धंधे जब बंद हैं, रोजगार का संकट है, वहीं कृषि प्रधान देश होने कारण ही हम दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कहीं ज्यादा अच्छी स्थिति में हैं। लॉकडाउन के कारण जब रेल, जहाज, सड़कमार्ग, स्कूल-कॉलेज, कार्यालय, कल-कारखाना, दुकानें सब कुछ बंद करनी पड़ी। इस विषम परिस्थिति में भी डेयरी और कृषि उद्योग ने ही पूरे देश की इज्जत रखी। ये बातें सुमुल डेयरी, सूरत, गुजरात के प्रबंध निदेशक एसवी चौधरी ने शनिवार को महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय द्वारा ‘कोरोना संकट, कृषि एवं डेयरी: मुद्दे, अवसर और चुनौती’ विषय पर आयोजित वेबिनार में कहीं। आगे कहा कि लॉकडाउन में डेयरी उद्योग के सामने भी कई चुनौतियां आईं। गांवों से दूध कलेक्शन और चारा लाने के लिए ट्रांसपोर्ट का मुद्दा, लेबर का मुद्दा और सब कुछ के बाद दूध के लिए मार्केट का बड़ा मुद्दा सामने आया है। लॉकडाउन में चाय की दुकान, मिठाई की दुकान, होटल, रेस्टोरेंट और ढाबों पर ताला लग गया है। सवाल आया कि इतने दूध का किया क्या जाए? ऐसी स्थिति में कोआपरेटिव वालों ने पशुपालकों को निराश नहीं किया। लोगों से फीडबैक लिया जाए तो कह रहे हैं कि डेयरी उद्योग ने बहुत अच्छा काम किया है। लिक्विड दूध, दही, श्रीखंड आदि बेचने पर ध्यान रहता था लेकिन लॉकडाउन के दौरान और क्या कर सकते हैं ये सोचने के लिए मौका मिला। लॉकडाऊन में सब्जी के खेती करने वालों का भारी नुकसान हुआ। हमने इस समस्या को समझा और जिस तरह सुमुल 1250 गांवों से दूध कलेक्ट करता था, उसी तरह गांवों से सब्जी लेकर पैक करके उपभोक्ताओं को ताजी सब्जी पहुंचायी जा रही है। किसानों को उनका उचित मूल्य दिया जा रहा है।

इससे पूर्व विवि के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने स्वागत वक्तव्य में सभी विशेषज्ञों व सहभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारत के 40 केंद्रीय विवि में अपने विद्यार्थियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से जुड़ने और कार्यक्रम करने में हम सबसे आगे हैं। ई-विमर्श के द्वारा हमने बहुत सारे शिक्षकों के व्याख्यान कराए हैं। फेसबुक लाइव के द्वारा भी बहुत सारे विद्वानों से पारंपरिक विषयों के साथ-साथ इस समय के आवश्यक विषयों पर व्याख्यान कराकर विद्यार्थियों को लाभान्वित किये हैं। 200 से ज्यादा सहभागियों के वेबिनार से जुड़ने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने सभी को शुभकामनाएं दीं।

एनडीडीबी डेयरी सर्विसेज, नई दिल्ली के प्रबंध निदेशक, डॉ ओमवीर सिंह ने अपने संबोधन के शुरुआत में केविवि परिवार को बधाई देते हुए कहा कि इतने कम समय में 200 से ज्यादा सहभागियों को जोड़कर इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कराने का प्रसंशनीय कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बहुत ही विस्तार से बताया कि कोविड-19 वायरस आने के बाद हमारे कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा है? इस महामारी से हमारे सामने क्या चुनौतियां हैं और क्या अवसर दिखाई दे रहे हैं? आगे कहा कि कोरोना का दखल हमारे देश में मार्च के मध्य में हुआ। एक तरफ लॉकडाउन की वजह से मजदूर कम हो गये तो दूसरी तरह जहां मैकेनाइज्ड हार्वेस्टिंग होती थी वहां मशीनों के खराब हो जाने, रिपेयरिंग न हो पाने से दिक्कत हुई। समय रहते जिन स्थानों पर मजदूर वापस लौट गये वहां कृषि कार्य आसान हो गया।
उन्होंने विवि के कुलपति से आग्रह किया कि इस बात पर चर्चा करायी जाए कि 6 करोड़ प्रवासी जो दूसरे राज्यों में काम करते हैं। इनकी क्या स्थिति व व्यवस्था रही होगी जो इतने दूर से कोई साईकिल, कोई रिक्शा और पैदल अपने घर के लिए निकलने लगा। यह नहीं सोचा कि इतनी दूर जाएंगे कैसे? अफसोस प्रकट करते हुए कहा कि हम-पढ़े लिखे लोग उन्हें भरोसा नहीं दिला पाए कि हम तुम्हें मरने नहीं देंगे!
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी, आईएआरआई, पूसा, नई दिल्ली के निदेशक प्रो.नगेंद्र कुमार सिंह ने कहा कोरोना संकट के इस दौर में कृषि क्षेत्र का महत्व सबको पता चल गया है। आज सारी दुकानें, मॉल्स और इंडस्ट्री बंद हैं लेकिन कृषि क्षेत्र खुला है। हमारे दैनिक जीवन की मूलभूत चीजें अन्न, दूध, सब्जी है। ये कृषि से ही मिलती हैं। आगे की स्थिति के बारे में कहा कि कोरोना का संकट क्षणिक है। स्थिति सामान्य होने के बाद लोग फिर शहरों की ओर आएंगे। कृषि पर आधारित जनसंख्या घटेगी, औद्योगिकरण बढ़ेगा। जब समस्या खत्म हो जाएगी. तो लोग जहां उद्योग है वहीं आएंगे, रोजगार वहीं हैं।

झारखंड स्टेट मिल्क फेडरेशन लिमिटेड, रांची के प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार सिंह ने कहा कि लॉकडाउन हुआ तो काफी परेशानी हुई। पहले तो लोग जानते थे कि झारखंड में दूध है ही नहीं। ये माना जाता था कि दूसरे राज्य से दूध आएगा तभी यहां चाय बनेगी। बाद में डेयरी उद्योग में प्रयास हुए, किसान जुड़ने लगे। हम अपना क्षेत्र बढ़ा ही रहे थे कि अचानक कोविड-19 आ गया और अचानक 30 प्रतिशत काम बढ़ गया। उसके पहले हम सोच रहे थे कि हम आपूर्ति कैसे करें। एक रात में दुनिया बदल गयी। सरकार के मिड डे मील योजना से जुड़ने का आश्वासन मिला। विपरीत परिस्थिति में भी हमनें किसानों तक नकारात्मक मैसेज नहीं जाने दिया। सकारात्मक दृष्टि अपनाने पर सबको लगा कि यह भी एक मजबूत क्षेत्र है। जो मजदूर बाहर से आ रहे हैं कह रहे हैं अब हम वापस नहीं जाएंगे। अगर वे जानवर खरीद लेते है तो दूसरे ही दिन से उनकी आमदनी का जरिया शुरु हो जाता है। चुनौती के साथ यह एक जबरदस्त अवसर भी है।

बापूधाम मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी, लिमिटेड, मोतिहारी के सीईओ, संदीप अंटील ने कहा कि लॉकडाउन की स्थिति में हमने बहुत कुछ झेला है तो कुछ सीखा भी है। हम लोग भाग्यशाली हैं कि अपनी डेयरी चलाने में सफल रहे। हमें किसानों का भी एंगल समझने की जरुरत है। हमारी डेयरी 52 हजार किसानों से जुड़ी है। हमें नजदीक से उनकी बात समझने का अवसर मिला है। पहले कहा जाता था कि हम अपने बच्चों को कृषि या डेयरी में नहीं आने देंगे। लेकिन पिछले एक महीने में यही सुनने में आया कि डेयरी और कृषि ही चलने वाला है। बिजनेस आगे बढ़ाने के लिए हम लोगों को थोड़ा अलग सोचना पडेगा।

वेरका मिल्क प्लांट, होशियारपुर के महाप्रबंधक, असीत शर्मा ने कहा कि कोरोना संकट में हमने धैर्य से काम लिया। पशुपालकों का एक भी लीटर दूध नुकसान नहीं होने दिया। हमारे कर्मचारी, ड्राईवर व सहयेगी डरे हुए थे। हमने सभी को प्रोत्साहित किया। सरकार की तरफ से कहा गया कि आप लोग भी कोरोना वारियर्स हो। सभी ने तय किया कि किसानों को झटका नहीं लगना चाहिए। अंत में कहा कि जब तक कोरोना का वैक्सिन तैयार नहीं हो जाता, तब तक मानना चाहिए कि यही स्थिति रहने वाली है। उसको ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना होगा।

कार्यक्रम के संयोजक व प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने विषय का परिचय दिया और सहभागियों से विशेषज्ञों का परिचय कराया। प्रो. सुधीर कुमार साहू वेबिनार के सह-संयोजक रहे। वेबिनार का संचालन सहायक प्रोफेसर डॉ. अल्का लल्हाल ने किया और सह प्रोफेसर डॉ. सपना सुगंधा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस वेबिनार में केविवि के प्रो.राजीव कुमार, प्रो. आनंद प्रकाश, प्रो.विकास पारीक, डॉ. बृजेश पाण्डेय, डॉ. दिनेश व्यास, डॉ.स्वाति कुमारी, कमलेश कुमार, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के डॉ.आदित्य कुमार मिश्रा समेत बड़ी संख्या में शिक्षकों, जानी-मानी डेयरियों के अधिकारी-कर्मचारी, कृषि जगत से जुड़े देश के विशेषज्ञों व विद्यार्थियों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

‘पर्यावरण और सतत विकास’ विषय पर वेबिनार का आयोजन


*प्रो. नवीन कुमार शर्मा, डॉ.शिव प्रताप सिंह व डॉ.वीरेंद्र कुमार मिश्रा ने सतत विकास को बताया मजबूत विकल्प*



*केविवि के वाणिज्य एवं प्रबंधन विज्ञान संकाय के तत्वावधान में हुआ आयोजन*



*प्रो. पवनेश कुमार ने की अध्यक्षता, प्रो. त्रिलोचन शर्मा रहे उपाध्यक्ष, डॉ.अल्का लल्हाल व डॉ.शिवेंद्र सिंह रहे आयोजन सचिव*


(6 मई 2020)
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के वाणिज्य एवं प्रबंधन विज्ञान विभाग के तत्वावधान में पर्यावरण और सतत विकास विषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के प्रोफेसर नवीन कुमार शर्मा ने  प्रथम वक्ता के तौर पर कहा कि कोरोना एक विश्वव्यापी महामारी है। अलग-अलग देशों ने इससे निपटने में अपने-अपने तरीके अपनाए। इसकी वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, यात्रा और आर्थिक आदि क्षेत्रों में अनपेक्षित स्थिति आ गई। यह बीमारी कैसे हुई इस पर चर्चा की जरुरत नहीं है। हमारी प्रतिक्रिया क्या रही और आगे हमारी प्रतिक्रिया किस तरह की होनी चाहिए इस पर विचार किया जाना चाहिए। इससे भारत ही नहीं प्रभावित है बल्कि दुनिया के तमाम देशों की जीडीपी माइनस में चली गयी। अपनी खोयी हुई इकोनॉमी फिर से रिकवर की जाए इसके लिए हमारी प्रतिक्रिया बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। हमें ग्रोथ एजेंडा बनाना होगा और सतत विकास की ओर बढ़ना होगा। जब तक हम पर्यावरण के मुद्दे पर सामाजिक सम्मति के साथ ध्यान नहीं देंगे तब तक विकास का मॉडल ठीक नहीं होगा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय 17 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) का जिक्र करते हुए कहा कि हमें इन्हें लागू करना होगा। कोरोना के उपचार पर कहा कि इसके खिलाफ शुरुआती रेस्पांस रिएक्टिव टाइप का रहा है। ऐसी बीमारियों को हमने कभी एजेंडा के तौर पर नहीं लिया। पहले भी इस तरह के हादसे हुए हैं किंतु हमने इन्हें लोकल प्रॉब्लम मान लिया। कोरोना के शुरुआती समय तो ये मान लिया गया कि ये चीन के वुहान तक ही सीमित है। आगे कहा कि पर्यावरण, बीमारी की प्रवृत्ति और अर्थव्यवस्था तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं। कोरोना फैलसे के दरम्यान कार्बन का उत्सर्जन कम हुआ है। एनर्जी की डिमांड कम हुई है। हम जैसे ही इकोनॉमी रिकवरी शुरु करेंगे, दुबारा ये समस्याएं या यही स्थिति में आ जाएगी। स्थायी समाधान के लिए अर्थव्यवस्था में पर्यावरण को स्थान देना होगा। हमारे कदम ऐसे होने चाहिए जो इनवायर्मेंट फ्रेंडली हों। पॉलिसी मेकर्स और शोध से जुड़े लोगों के लिए यह एक चुनौती है कि ऐसी टेक्नालॉजी लाएं जिसमें एनवायरमेंट कम से कम प्रभावित हो। गंभीरता से विचार करें तो हम पाएंगे कि इन दिनों माइग्रेशन बढ़े हैं। माइग्रेशन का क्या रोल है बीमारी के फैलने में और बीमारी की क्या भूमिका है अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में, यह बिंदु विचारणीय है। बीमारी फैलने में युद्ध और आतंकवाद का भी योगदान है। पाकिस्तानी आतंकवादियों से सीरिया में पोलियो फैला।



भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि एवं अभियांत्रिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शिव प्रताप सिंह ने अपने व्याख्यान में कहा कि विकास के लिए पर्यावरण को हानि नहीं पहुंचना चाहिए। हम कृषि आदि कार्यों में ट्रैक्टर व डीजल इंजन इस्तेमाल करते हैं जिनसे भारी मात्रा में कार्बन उत्पन्न होता है। हमें पारंपरिक ऊर्जा की जगह वैकल्पिक ऊर्जा की ओर ध्यान देना होगा। इसे हम इस नजरिये से हम समझ सकते हैं कि हम टेक्नालॉजी को कैसे विकसित करें कि पर्यावरण संतुलित रहे। हम बैट्री के जरिये भी कुछ मशीनों को चलाएं तो हम पर्यावरण पर दबाव कर सकते हैं। बैट्री तैयार करने की जो प्रणाली है वहां भी ऊर्जा खत्म हो रही है तुलनात्मक रुप से पूरी प्रक्रिया को देखें तो यह पारंपरिक ऊर्जा से कम है। वैक्सिन के साइड इफेक्ट के सवाल पर कहा कि हां कुछ समस्याएं हैं लेकिन लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि वैक्सिन ने कई मौकों पर त्वरित रुप से बहुत सारी जिंदगियां बचाई हैं। एलोपैथिक दवाओं के भी साइड इफेक्ट्स हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन सवाल है कि कब तक कोरोना जैसी बीमारी के डर से हम सोशल डिस्टेंसिंग बरकरार रखें। हमारे सामने कई चुनौतियां हैं जैसे वैक्सिन को एक स्टैंडर्ड कंडीशन में रखना पड़ता है। कई बच्चे इसकी वजह से बोलना देर से शुरु करते हैं। लेकिन वैक्सिन ही है जो बड़ी संख्या में लोगों को मरने से बचाएगा।



काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के पर्यावरण एवं सतत विकास विभाग के सह-प्रोफेसर डॉ.वीरेंद्र कुमार मिश्रा ने कहा कि भारत में सतत विकास सिर्फ प्रचलन में ही नहीं है बल्कि यह हमारी जीवन पद्धति रही है। लेकिन वर्तमान में हम विकास की दौड़ में हैं और अपने प्राकृतिक संसाधनों को खो रहे हैं। जैसे हर व्यक्ति की अपनी प्रतिरोधक क्षमता होती है। जब तक क्षमता से अधिक कोई समस्या नहीं हो जाती या जब तक हम बीमार नहीं हो जाते तब तक हम नहीं जान पाते कि कुछ गलत हो रहा है। ठीक यही प्रक्रिया प्रकृति के साथ भी है। भारत के गौरवपूर्ण परंपरा की बात करते हुए कहा कि भारतीय मानव मूल्य सतत विकास से जुड़े हुए हैं। कोरोना वायरस जैसी स्थिति हमारे लिए चेतावनी है। इससे निपटना बहुत सरल भी है बहुत कठिन भी है। पहले हमारे दादी-नानी के जमाने में घर के अंदर खास तौर से किचन के अंदर चप्पल पहनकर जाना मना था। हमारे बुजुर्ग जब बाहर से आते थे तो पहने हुए कपड़े उतारकर नहाते थे, तभी घर में आते थे। हमें उन तरीकों का सम्मान करना चाहिए। मानवता जब संकट में आती है तब ही इन बातों की चर्चा होती है कि क्या करें और क्या ना करें? कोरोना को खत्म करने के लिए अगर किसी वैक्सिन या दवा की खोज हो जाए तो इस बात की चर्चा बंद हो जाएगी कि यह वायरस कैसे आया, क्यों फैला? जबकि विकास के लिए अब जो भी योजना बने उसके केंद्र में पर्यावरण और सतत विकास होना चाहिए। बाढ़ और भूकंप आ जाने के बाद की स्थितियों से निपटने के लिए हमारे पास कुछ मैकेनिज्म होता है लेकिन कोरोना बिल्कुल अनपेक्षित समस्या है। विश्व व्यवस्था में सुपरपावर तक कोरोना के आगे असहाय है। हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है कि हम लॉकडाउन जैसी स्थिति को लम्बे समय तक झेल सकें। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, पर्यावरण बदल रहा है। आज कोरोना है कल कुछ और हो सकता है। हमें इसके बारे में पहले से सोचना होगा और सतत विकास मॉडल अपनाना होगा। अर्थतंत्र, पॉलिसी मेकर, विश्वविद्यालयों को इस दिशा में सोचना पड़ेगा।



केविवि कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने विवि द्वारा लगातार उपयोगी विषयों पर वेबिनार आयोजित होने पर प्रसन्नता जाहिर की और उम्मीद जताई कि व्याख्यान में सामने आई बातों को लोग अपने जीवन में उतारेंगे। बेविनार के अध्यक्ष व वाणिज्य एवं प्रबंधन संकाय के अधिष्ठाता डॉ. पवनेश कुमार ने सभी व्याख्याताओं की भूरि-भूरि प्रसंशा की और इस उपयोगी विषय पर चर्चा के लिए सभी व्याख्याताओं एवं सहभागियों को बधाई दी। वेबिनार के उपाध्यक्ष व वाणिज्य विभाग के प्रो. त्रिलोचन शर्मा ने इस वेबिनार का हिस्सा होने पर प्रसन्नता व्यक्त की। आयोजन सचिव डॉ.अल्का लल्हाल और डॉ.शिवेंद्र सिंह ने क्रमशः कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन किया। इस वेबिनार में सह-प्रोफेसर डॉ. सपना सुगंधा, कमलेश कुमार, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के डॉ. आदित्य कुमार मिश्रा आदि शिक्षक व अर्पित वर्मा, शैलेष रंजन, खुशी पोद्दार, अभिषेक जायसवाल, तुषार आर्या समेत बड़ी संख्या में विद्यार्थी ऑनलाइन उपस्थित रहे।

रोजगार के लिए शहरों की बजाय गांवों की तरफ देखने का आह्वाहन



*केविवि के प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने दिया विशेष व्याख्यान*

*‘कोविड-19 के पश्चात आर्थिक चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान*

*बड़ी संख्या में विद्यार्थियों व अध्यापकों ऑनलाइन दर्ज कराई उपस्थिति*
(5 मई 2020)
लॉकडाउन का समय सभी के लिए संकटों भरा है, बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार छूट गये हैं, मजदूरों की समस्या विकराल रुप ले चुकी है ऐसे में निराश होने की बजाय पॉजिटिव सोच के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है। सरकार अपनी तरफ से प्रयास कर रही है, हमें भी अपनी जिम्मेदारी निभानी है। गांवों से शहरों की तरफ जो मजूदर गये थे वे वापस घरों की ओर आने लगे हैं। शहरों में कुछ दिनों तक काम-काज पर इसका असर पड़ेगा। अब वक्त आ गया है कि रोजगार के लिए युवा शहरों की तरफ देखने की बजाय गांव में ही अपना उद्यम शुरु करें। ये बातें महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ‘कोविड-19 के पश्चात आर्थिक चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान में कही। ज्ञात हो कि कोरोना संकट के दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, केविवि इकाई ने फेसबुक लाइव के माध्यम से व्याख्यानों की श्रृंखला शुरु की है। इसी क्रम में मंगलवार को प्रो. पवनेश कुमार ने विद्यार्थियों एवं अध्यापकों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस समय भय और निराशा का माहौल है। वस्तुओं का विक्रय कम हो गया है। लेकिन भय और निराशा से निकलकर अपने पॉजिटिव सोच से माहौल बदलने की आवश्यकता है। उत्पादन हो और उत्पादों की डिमांड बढ़े इस ओर प्रयास करने की आवश्यकता है। रोजगार के लिए गांवों से शहरों की ओर गये और संकट में फंसकर पुनः गांवों की ओर लौट रहे मजदूरों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह स्थिति मजदूरों के लिए ही नहीं बल्कि उद्योगों के लिए भी चिंताजनक है। उद्योग-धंधे शुरु होंगे तो मजदूरों की कमी हो जाएगी। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि 10-15 हजार की नौकरी के लिए शहरों की ओर पलायन करने वाले युवाओं को सही राह दिखाई जाए। सरकार स्किल डेवलपमेंट योजना चला रही है जिसका असर भविष्य में देखने को मिलेगा। सरकार द्वारा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, पॉलिटेक्निक कॉलेजों और इंजिनीयरिंग कॉलजों को अपडेट कर रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को चलाया जा रहा है। भारत ही नहीं विदेशों में भी स्किल्ड युवाओं की मांग है।
केविवि के एक छात्र का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे एक विद्यार्थी ने टिफिन पहुंचाने का काम शुरु किया। किसी से रोजगार मांगने की बजाय शहर में अध्ययन-अध्यापन कर रहे लोगों तक टिफिन पहुंचाकर वह अपना उद्यम कर रहा है। ऐसे लोगों की प्रशंसा और प्रोत्साहन की जानी चाहिए। नौकरी को उत्तम और कृषि आदि कार्यों को हेय दृष्टि से देखने की आलोचना करते हुए उन्होंने एक पुरानी कहावत ‘उत्तम खेती’ का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति के दो बेटे हैं। एक बेटा शहर में 10-15 हजार रुपये की नौकरी करता है और दूसरा बेटा गांव में ही कृषि आदि कार्य करके अपनी आजिविका कमाता है तो अभिभावक शहर वाले बेटे की प्रशंसा करते हैं और गांव वाले बेटे को हतोत्साहित करते हैं। यह गलत नज़रिया है। इस नज़रिये को बदलना ही होगा। आगे कहा कि हम लोग महात्मा गांधी के नाम से स्थापित विवि से जुड़े हैं, मैं गांधी जी की धरती से गांधी जी को याद करते हुए उनके ग्राम स्वराज की बात कहता हूं।

आज विकास 3000 शहरों तक ही सिमित होकर रह गया है। ये शहर विकास के टापू बन गये हैं। सभी लोग वहां जाकर काम करते हैं। अब तक गांवों को नजरअंदाज किया गया है। वर्तमान सरकार अब गांवों की तरफ देख रही है। गांव-गांव बिजली पहुंच रही है, गांवों तक उज्वला योजना पहुंच गयी है। गांवों में अब रोजगार स्थापित करने की आवश्यकता है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच कंपनियां अब चीन से अपना काम-काज खत्म कर दूसरे देशों में अपना उद्योग स्थापित करना चाहती हैं। चाइना विश्व का सबसे बड़ा मैनुफैक्चरिंग हब है लेकिन परिस्थितिवश कुछ कंपनियां वहां से दूसरे जगह आना चाहती हैं। ऐसे में भारत को उनके लिए दरवाजे खोलने चाहिए। अपनी आवश्यकता के अनुसार सुविधाएं देकर कंपनियों को ग्रामीण क्षेत्रों में लाने का प्रयास करना चाहिए। जिससे ये कंपनियां ग्रामीण क्षेत्रों में आकर स्थानीय लोगों को रोजगार दे सकें।
‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ की बात करते हुए कहा कि मुजफ्फरपुर लीची के लिए और दरभंगा मखाना के लिए जाना जाता है। इस तरह और भी तमाम जिले हैं जिनकी अपने विशेष उत्पादों के लिए विशिष्ट पहचान है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना से इन जिलों के लोगों को ही नहीं बल्कि आस-पास के क्षेत्रों में भी लोगों को रोजगार मिलेगा। भारत की जनसंख्या को अभिशाप समझने के नज़रिये पर चोट करते हुए कहा कि जो हमारी जनसंख्या है वह संपदा है, समस्या नहीं है। इंडिया की जो ताकत है वह उसका मार्केट है साथ ही यहां मजदूर भी है। शहरों से गांवों को रोजगार का हब बनाकर संतुलन बनाने की जरुरत है। शहरों में दूध और शहद जैसे उत्पादों की जरुरत है। लोगों को ये उत्पाद नकली मिल रहे हैं। ऐसे शुद्ध उत्पादों की ओर भी रोजगार की संभावना है। आज आर्गेनिक फार्मिंग की आवश्यकता है। ये प्रोडक्ट फैशन नहीं है बल्कि अनिवार्य हो गये हैं। युवाओं को इस ओर देखने की आवश्यकता है। फाइनेंसियल सिस्टम को दुरुस्त करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि उद्यमी को जिस तरह आसानी से लोन मिल जाता है उस तरह से किसानों को आसानी से लोन क्यों नहीं मिलता? इस ओर कार्य करने की आवश्यकता है। कृषि योग्य भूमि की समस्या पर कहा कि हमारे यहां लैंड होल्डिंग छोटी-छोटी है। यहां भी कॉपरेटिव फार्मिंग या कांट्रैक्ट फार्मिंग की आवश्यकता हो गयी है। कॉपरेटिव मॉडल का जिक्र करते हुए कहा कि अमूल गुजरात का सक्सेजफूल कॉपरेटिव मॉडल है। आगे कहा कि केएफसी जैसी कंपनी करोड़ों रुपये कमा रही है। बिहार में मछली की डिमांड बहुत है। क्यों ना हम मछली के लिए वैसी ही व्यवस्था करें जैसा वह कंपनी चिकन के लिए करती है। अंत में उन्होंने सकारात्मक सोच रखकर संकट के समय में भी आगे बढ़ने की बात कही।
इस व्याख्यान में केविवि के प्रो.आशीष श्रीवास्तव, प्रो.विकास पारीक, प्रो. बिमलेश कुमार, डॉ. पाथलोथ ओमकार, कमलेश कुमार, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के डॉ. आदित्य कुमार मिश्रा आदि शिक्षकों व बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराई।

‘विषम समय में सकारात्मक कैसे रहें’ विषय पर वेबिनार का आयोजन



प्रो. तृप्ति बर्थवाल, डॉ. संगीता साहू, प्रो.अमरेंद्र पी.सिंह, नुपुर रस्तोगी व अभिषेक मिश्रा ने पॉजिटिव रहने के सिखाए गुर


प्रो. पवनेश कुमार ने की अध्यक्षता, बड़ी संख्या में अध्यापक व विद्यार्थी रहे मौजूद


कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने जताई प्रसन्नता, कहा-पॉजिटिव सोच हर परिस्थिति में सहायक

(4 मई 2020)
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग द्वारा सोमवार को ‘विषम समय में सकारात्मक कैसे रहें’ विषय पर ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन किया गया। एचपीसीएल, मित्तल एनर्जी लिमिटॉ नोएडा के डिप्टी मैनेजर अभिषेक मिश्रा ने अपने व्याख्यान में कहा कि वर्तमान समय में हम सभी लोग असामान्य परिस्थिति से गुजर रहे हैं। इस परिस्थिति में लोगों में तनाव होना स्वाभाविक है। सभी के तनाव का स्तर अलग-अलग है। तनाव से निपटने के लिए ये समझना ज़रुरी है कि तनाव होता क्या है, कितने  प्रकार का होता है, तनाव चर्चा का बड़ा मुद्दा क्यों है और स्ट्रेस मैनेजमेंट क्यों महत्वपूर्ण हो जाता है? आगे बताया कि तनाव का बड़ा कारण कार्य की मांग, हर वक्त अपना चलाते रहना, अत्याधुनिक गजट का बढ़ता उपयोग है। भारत में बड़ी आबादी तनाव को हल्के में लेती है और इससे निपटने के लिए प्रोफेशनल के पास नहीं जाती। प्रतियोगिता के इस युग में लोगों में जॉब सिक्योरिटी, मनी प्राब्लम, रिलेशन प्राब्लम या पर्सनल हेल्थ जैसे मुद्दों को लेकर तनाव रहता है। इसके प्रभाव में आकर लोग अपने परिवार के सदस्य से या दोस्त तक से लड़ जाते हैं। अगर इससे सही से न निपटा जाए तो यह बहुत सारी बीमारियों की जड़ हो सकती हैं। इससे कई स्तरों पर निपटना होता है। अगर आप कामकाजी हैं, आपके पास काम ज्यादा है तो टाइम मैनेजमेंट करना होगा। टाइम मैनेजमेंट केवल प्रोफेशनल्स के लिए नहीं बल्कि विद्यार्थी के लिए भी जरुरी है। आपको काम को कई कैटेगरी में बांटना होगा जैसे- अर्जेंट बट नॉट इम्पार्टेंट, इम्पार्टेंट बट नॉट अर्जेंट, नॉट अर्जेंट नॉट इम्पार्टेंट आदि। आपको अपना गोल तय करके आगे बढ़ना होगा। अपनी सोच को पॉजिटिव सोच रखना जरुरी है। तनाव से बचने के लिए मेडिटेशन बहुत जरुरी है। इसके साथ ही कुछ हल्के व्यायाम, हेल्दी डाइट और फ्रेंड्स व कलीग के साथ जुड़ाव काफी मददगार साबित हो सकता है। लॉकडाउन जैसी कठिन परिस्थिति में रचनात्मक ढंग से अपने स्किल को बनाना चाहिए।

लाल बहादुर शास्त्री प्रबंधन संस्थान, लखनऊ की प्रो. तृप्ति बर्थवाल ने अपने व्याख्यान में कहा कि लॉकडाउन ही नहीं इंसान को हर परिस्थिति में पॉजिटिव एट्टिट्यूड रखना चाहिए। पॉजिटिव एट्टिट्यूड के बारे में बहुत सारी किताबें, विडियो, गीत-गजल मौजूद हैं। इसके बारे में नया कहना बहुत मुश्किल है। पॉजिटिव एट्टिट्यड सुनने में बड़ा अच्छा लगता है लेकिन लोग इस पर कायम क्यों नहीं रह पाते हैं। आगे कहा कि किसी भी परिस्थिति में घबराने की बजाय पॉजिटिव ढंग से समाधान की ओर बढ़ना चाहिए। एक उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे पूर्वज जंगल में रहते थे। उन्हें रात में सोने के समय ही नहीं बल्कि दिन में जगे रहने पर भी अलर्ट रहना पड़ता था। हम भूल जाते हैं कि हमारे पूर्वज उतने खराब स्थिति से हमें यहां तक ला सकते हैं तो आज तो हम शारीरिक, मानसिक और भौतिक रुप से काफी विकास कर चुके हैं। आज हम पॉजिटिव सोच से आगे बढ़ते हुए कठिन से कठिन परिस्थिति से मुकाबला कर सकते हैं। आगे कहा कि पॉजिटिव सोच के अलावा आपके पास दूसरा विकल्प क्या है? उन्होंने दलाई लामा, राम-कृष्ण आदि विशिष्ट जनों व देवी-देवताओं का जिक्र करते हुए समझाया कि कठिन परिस्थिति सबके जीवन में आती है और उसका मुकाबला पॉजिटव रहकर ही किया जा सकता है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विवि, अमरकंट के प्रो. अमरेंद्र पी सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि खुश रहना और पॉजिटिव रहना क्यों जरुरी है और कैसे हम हर परिस्थित में खुश और पॉजिटिव रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर नकारात्मक ही बयां करते हैं कि मेरे साथ ये हो गया,  दुनिया में सब खराब है। जबकि हकीकत ये है कि दुनिया में ऊंच-नीच होती रहती है। आप एक्सेप्टेंस बढ़ाएंगे तो ही आप खुश रह पाएंगे। खुशी और पॉजिटिविटी अपने आप नहीं आती, आपको प्रोग्रामिंग करना होगा। संसार में दुखी रहना कोई नहीं चाहता फिर ज्यादातर समय खुश वही रहता है जो खुश रहने का प्रयत्न करता है। नकारात्मक पहलू पर फोकस करियेगा तो नकारात्मकता को ही आकर्षित कीजियेगा। इसलिए हंसने-मुस्कुराने की आदत डालिए। कहना गलत नहीं होगा कि हंसने वाले के साथ दुनिया हंसती है और रोने वाले के साथ कोई नहीं रोता। लॉकडाउन के बारे में कहा कि ये बुरी परिस्थिति है लेकिन ज़रा सोचिये कि अगर ये परिस्थिति न होती तो आज जिन लोगों से मैं मिल रहा हूं, नहीं मिल पाता और ये वेबिनार भी नहीं होता। अंत में कहा कि दुनिया में सबकुछ बुरा नहीं है। जो भी निगेटिव चीजें आती हैं उसे पॉजिटिव ढंग से निपटिये। जो चीज आप कंट्रोल नहीं कर सकते, उसके पीछे मत भागिये। अपने एट्टीट्यूड को कंट्रोल कीजिये। अपनी खुशी के लिए आप खुद जिम्मेदार बनिये। किसी और को अधिकार मत दीजिये कि वो आपको दुखी करे।

बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग, लखनऊ विवि की डॉ. संगीता साहू ने अपने व्याख्यान की शुरुआत समय के महत्व को बताते हुए की। रामायण का जिक्र करते हुए कहा कि धारावाहिक शुरु होता है तो मैं समय हूं कहकर शुरु होता है। आगे कहा कि आज समय कोविड-19 का है। लोग लॉकडाउन में रहने को मजबूर हैं। इस परिस्थिति में हम क्या अच्छा कर सकते हैं इस बारे में फोकस करने की आवश्यकता है। केवल बीते हुए कल को याद करके समय नष्ट मत कीजिये, केवल भविष्य की चिंता में मत रहिए बल्कि जो समय अभी चल रहा है, उसका पॉजिटिव ढंग से उपयोग करके आगे बढ़िये। कोई भी व्यक्ति अपनी सोच, धारणाओं के नजरिये से समय को देखता है। टाइम ओरिएंटेश में हमें दो तरह के अंतर देखने को मिलते हैं। टाइम मैनेजमेंट बहुत जरुरी है। चित्र के ज़रिये उन्होंने समझाया कि दो तरीके से टाइम मैनेजमेंट किया जाता है। पहला इम्पॉर्टेंट एक्टिविटि और दूसरा अर्जेंट एक्टिविटी। जो अर्जेंट काम होता है उसमें तुरंत रेस्पांस की मांग रहती है। आप अपना गोल सेट कीजिये डेडलाइन सेट कीजिये, पॉजिटिव ढंग से आगे बढ़िये। आप खुश रहेंगे और अपना लक्ष्य हासिल करेंगे।

आभार आरा लाइफ स्किल्स, नोएडा की को-फाउंडर व निदेशक नुपुर रस्तोगी ने अपने व्याख्यान में बहुत ही रोचक ढंग से बताया कि अगर कोई स्थित टफ है तो आप उसे कैसे हैंडेल करेंगे। टफ को उन्होंने उसकी स्पेलिंग के अनुसार विभक्त करते हुए ट्रांसफॉर्म, ऑपरेशन स्किल, अप स्किल, ग्रोथ और हैप्पीनेस के द्वारा कठिन से कठिन परिस्थिति में मुस्कुराकर आगे बढ़ने के बारे में बताया। इसके अलावा उन्होंने सकारात्मकता में वृद्धि के लिए संगीत और रचनात्मक सोच को सहायक बताया।

विवि के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने प्रबंधन विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित इस वेबिनार पर प्रसन्नता जताते हुए वर्तमान परिस्थिति में इस विषय पर चर्चा को अत्यंत ही महत्वपूर्ण बताया। आगे कहा कि पॉजिटिव सोच के साथ कठिन से कठिन परिस्थिति में सफलता पाई जा सकती है। वेबिनार की अध्यक्ष और प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने इस वेबिनार में सभी व्याख्याताओं की उनके उपयोगी व्याख्यानों के लिए प्रशंसा की और और आगे भी इस तरह के वेबिनार आयोजित करने के लिए कहा। वेबिनार के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सुधीर कुमार साहू ने भी वेबिनार के आयोजन पर प्रसन्नता जताई। वेबिनार की संयोजक डॉ. सपना सुगंधा ने वेबिनार का संचालन किया और कार्यक्रम को सफल बताया। प्रबंधन विज्ञान विभाग के शोधार्थी सिद्धार्थ घोष ने सभी व्याख्याताओं, शिक्षकों व उपस्थित विद्यार्थियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

‘कोविड-19 के बाद उद्यमिता, चुनौतियां और अवसर’ विषय पर ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन



*डॉ. आशीष भटनागर, डॉ.राहिल यूसूफ ज़ई, डॉ. राज कुमार सिंह व डॉ.सरोज रंजन आदि विशेषज्ञों ने दिया व्याख्यान*

*प्रो. पवनेश कुमार ने की अध्यक्षता, बड़ी संख्या में अध्यापक व विद्यार्थी रहे मौजूद*

*कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने की सराहना, आगे भी वेबिनार कराने पर दिया ज़ोर*

(2मई)
 महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग द्वारा शनिवार को ‘कोविड-19 के बाद उद्यमिता, चुनौतियां और अवसर’ विषय पर ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन किया गया। इस आयोजन में उद्यमिता विकास संस्थान, अहमदाबाद के डॉ. आशीष भटनागर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के डॉ.राहिल यूसूफ ज़ई, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साईंस, वाराणसी के डॉ.राज कुमार सिंह व विनोबा भावे विश्वविद्यालय, झारखंड के डॉ. सरोज रंजन ने बतौर विशेषज्ञ व्याख्यान दिया। डॉ. आशीष भटनागर ने अपने व्याख्यान में बताया कि कोरोना एक वैश्विक संकट है। इससे भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देश जूझ रहे हैं। उद्योग-धंधे बंद हो जाने से भारत में भी बड़ी संख्या में लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार काम-धंधे शुरु कराकर अर्थव्यवस्था पटरी पर लाने का प्रयास कर रही है। लेकिन अचानक से सब कुछ शुरु नहीं किया जा सकता। प्रबंधन विज्ञान से जुड़े विद्यार्थियों, अपना उद्यम शुरु करने या कोविड-19 के बाद अपने उद्यम को पुनर्स्थापित करने के इच्छुक लोगों के लिए उन्होंने बताया कि नये परिदृश्य को समझते हुए हेल्थ, टेक्नॉलॉजी, फॉर्मा, रिटेल, एजुकेशन सेक्टर, होम डिलीवरी के क्षेत्र में काम करके सफलता हासिल की जा सकती है। डॉ.राज कुमार सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि इस समय केवल कर्मचारी ही नहीं नियोक्ता भी परेशान हैं। दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत की भी जीडीपी बुरी स्थिति में है। चुनौती के इस समय में हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय इसे अवसर में बदलना होगा। कुछ समय तक स्थिति खराब ही रहने वाली है, सब कुछ अचानक से पटरी पर नहीं आ जाएगा इस बात को समझते हुए अपने कारोबार के अस्तित्व को बचाए रखना होगा। रेगुलर प्रोडक्शन की बजाय लिमिटेड प्रोडक्शन पर ध्यान देना अनिवार्य है। आगे कहा कि इस परिस्थिति से हर वर्ग के लोग परेशान हैं। सरकार भी कोशिश कर रही है, उसे सैलरी के रुप में बहुत बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है, जबकि इन्कम बंद है। उद्यमियों से उन्होंने इस विषम परिस्थिति का आंकलन करते हुए इंटरनेशनल टूरिज्म, सप्लाई चैन, लॉजिस्टिक और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के क्षेत्र में मजबूती से काम करने की आवश्यकता बताई।

 डॉ.राहिल यूसूफ ज़ई ने अपने व्याख्यान के शुरुआत में कहा कि आज बहुत ही प्रासंगिक विषय पर चर्चा हो रही है। यह समय समस्या को बड़ा बताकर चिंता जताने की बजाय कुछ ठोस काम करने की आवश्यकता है। लॉकडउन में लोग अपने घरों में बैठने को बाध्य हैं। उनका समय टेलीविजन और ऑनलाइन माध्यमों पर खर्च हो रहा है। लोगों की इस जरुरत समझते हुए एंटरटेनमेंट एरिया जैसे-विडियो, मूवी, गेमिंग आदि के क्षेत्र में काम करके लाभ कमाया जा सकता है। विद्यार्थियों एवं उद्यमियों से उन्होंने हेल्थ सेक्टर पर ध्यान केंद्रित कर हेल्थ ऐप, मेडिटेशन ऐप, टेलीमेडिसिन, टेली कंसलल्टेशन के क्षेत्र में उद्यम एवं रोजगार तलाशने की बात कही। आगे कहा कि आपकी सफलता इस बात पर निर्भर है कि तेजी से बदल रहे वातावरण में आप कितना बदलाव कर पाते हैं? एक उद्यमी के अंदर प्राब्लम साल्विंग स्किल और अच्छी कम्यूनिकेशल स्किल होना ही चाहिए। ये गुण आपको हर क्षेत्र में फायदा पहुंचाते हैं। यह समय इन गुणों को सीखने के लिए सर्वाधिक अनुकुल है। डॉ. सरोज रंजन ने अपने संबोधन में कहा कि कोविड-19 एक बड़ा संकट है लेकिन याद रखना होगा कि हर संकट कुछ अवसर भी लेकर आती है। इस समय लेबर क्राइसेस, फाइनेंसियल क्राइसेस, और डिमांड एंड प्रोडक्शन रेसियो एक बड़ी चुनौती है। तत्काल मार्केट बनने नहीं जा रहा है, रेगुलर प्रोडक्शन करियेगा भी तो किसके लिए? लिस्ट इंकम की इस स्थिति में कोई बड़ी खरीददारी नहीं करने जा रहा है, फिलहाल लक्जरी सामान तो बिल्कुल नहीं खरीदी जाएगी। इस स्थिति में एक कुशल उद्यमी के लिए जरुरी है कि वह अपनी कुशल रणनीति से उत्पादों की मांग पैदा करे। इसके लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट करेंगे तो सोल्यूशन मिलेगा। मार्केट रिसर्च बड़ा अवसर दिलाएगा। मार्केटिंग एरिया, एचआर और फाइनेंसियल क्षेत्र में अवसर मिल सकता है। मजदूर और कर्मचारी के साथ-साथ बड़ी-बड़ी कंपनियां समस्याओं से ग्रस्त हैं। समस्या की प्रवृत्ति को देखते हुए बिजनेस मैन को आनलाइन होने का वक्त आ गया है। अगर आप समस्या को समझ रहे हैं तो आप इस स्थिति से निपट सकते हैं। सवाल-जवाब के सत्र में डॉ भटनागर ने बताया कि पीएम ईजीपी स्कीम से आप मैनुफैक्चरिंग के लिए लोन ले सकते हैं। इसमें खादी ग्रामोद्योग के जरिये कहीं किसी ऑफिस में नहीं जाना है। कहीं रिश्वत देने की जरुरत नहीं है और सारी सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं। मुद्रा लोन के ज़रिये भी आप अपना प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर अपने बैंक को प्रजेंट कर सकते हैं। किसी वजह से अगर आपका प्रपोजल रिजेक्ट हो रहा है तो बैंक आपको बताएगा। आप उसे फिर से सुधारकर दुबारा प्रयास कर सकते हैं। राज कुमार सिंह ने बताया कि सबसे बुरा प्रभाव इंटरनेशनल टूरिज्म पर पड़ेगा। भविष्य की ओर देख रहे उद्यमियों के लिए बताया कि आपको टूरिज्म स्पॉट बनाना पड़ेगा। वर्चुअल टूरिज्म का एरिया इससे जुड़ रहा है। आपको रुरल टूरिज्म की ओर देखना होगा। आज के बच्चों ने फिल्मों में ही तालाब, कुआँ, खेत, और बैल देखा होगा, रियल में नहीं देखा होगा या बहुत कम देखा होगा। रुरल टूरिज्म से आप लाभ कमा सकते हैं। सरकार को भी आगे आना पड़ेगा।

 विवि के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने प्रबंधन विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित इस वेबिनार को सार्थक बताते हुए सराहना की और विभागाध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार से आगे भी इस तरह के वेबिनार आयोजित करने के लिए कहा। वेबिनार के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने इस कार्यक्रम को बहुत ही सफल बताया। आयोजन सचिव डॉ. अल्का लल्हाल ने कार्यक्रम का संचालन किया। डॉ. स्वाति मनोहर ने बड़ी संख्या में जुटे अध्यापकों, विद्यार्थियों और विषय से जुड़े विशेषज्ञों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

*केविवि के विद्यार्थियों ने 'शेयर बाज़ार में समकालीन मुद्दे' विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान में की भागीदारी*


प्रबंधन अध्ययन संस्थान, गाज़ियाबाद के निदेशक प्रो. आलोक पाण्डेय व दिल्ली विवि के सह प्रोफेसर डॉ अमित कुमार सिंह ने बतौर विशेषज्ञ की शिरकत*


*कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने दी बधाई, प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.पवनेश कुमार ने व्याख्यान को बताया उपयोगी*

(24 अप्रैल )
महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रबंधन विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों के लिए शुक्रवार (24, april) को 'शेयर बाज़ार में समसामयिक मुद्दे' विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में प्रो. आलोक पाण्डेय निदेशक, प्रबंधन अध्ययन संस्थान, गाज़ियाबाद और डॉ. अमित कुमार सिंह, सह प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, दिल्ली विवि, दिल्ली ने बतौर विशेषज्ञ शिरकत की। प्रो. पाण्डेय ने अपने संबोधन में शेयर बाज़ार का मतलब, प्राइमरी मार्केट, सेकेण्डरी मार्केट, म्यूचुअल फंड, रेगुलेशन, इकॉनॉमिक ग्रोथ, लो इकॉनॉमिक ग्रोथ आदि को बड़े ही सरल शब्दों में विस्तार से बताया। कोरोना जैसे वर्तमान वैश्विक संकट के प्रभाव को चार्ट और ग्राफ के जरिये समझाते हुए कहा कि अब भारत की ग्रोथ रेट 0.8 से आगे बढ़ेगी, जबकि विश्व के कई मजबूत देश शून्य से भी नीचे के ग्रोथ रेट अर्थात निगेटिव से ऊपर उठेंगे। भारत के विकास दर के बारे में कहा कि पिछले 4-5 सालों से हमारी ग्रोथ रेट गिरी है। इसके कई कारण हैं। जीएसटी के बारे में लोग समझ नहीं पा रहे हैं। जबकि अगर इसे सही से लिया जाए तो काफी विकास किया जा सकता है। प्रो. पाण्डेय ने विद्यार्थियों से बैंजेमिन ग्राहम की किताब पढ़ने का सुझाव दिया।

वहीं अपने संबोधन में डॉ. अमित ने कहा कि स्टॉक मार्केट को पढ़ते समय ठीक-ठीक वैल्यूएशन करने का गुण आना चाहिए। हम जो शेयर बेचते या खरीदते हैं उसका वैल्यू पता हो तो ही हम फायदा कमा सकते हैं। एक शेयर का जो दाम दिख रहा होता है, वास्तव में वो है या कुछ और है इसका अनुमान लगाना आवश्यक है। कभी-कभी लो इकॉनॉमिक ग्रोथ के समय में अच्छी कम्पनी का शेयर कम दिखता है और खराब कम्पनी का शेयर अच्छा दिखता है। इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए। आगे कहा कि इन्वेस्ट करते समय कम्पनी का मालिक बनकर सोचिये। कंपनियां जानती हैं कि हालत बदलते रहेंगे मानव व्यवहार नहीं बदलेंगे। उदाहरण देते हुए बताया कि टाइटन ने पहले घड़ी बेचने से शुरुआत की फिर तनिष्क ज्वैलरी की शुरुआत की और फिर चश्मा के बिजनेस में आ गई और टाइटन आई प्लस आ गया। टाइटन को आए 18 साल हो चुके हैं, उसका नाम लोगों के जेहन से नहीं जा रहा है। लोग आज भी इंवेस्टमेंट कर रहे हैं।

इस चर्चा में नागपुर से जुड़े डॉ. मनीष व्यास, डॉ. तपन घोष, प्रबंधन विभाग के शोधार्थी सिद्धार्थ घोष आदि ने कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे जिनका जवाब प्रो. पाण्डेय और डॉ. अमित ने बारी-बारी से दिया। प्रो. तपन नायक के एक सवाल के जवाब में प्रो. पाण्डेय ने कहा इंडस्ट्री को अगले 1-2 साल बहुत सतर्क रहना होगा और आपको बतौर इन्वेस्टर, इंवेस्ट करते समय सिर्फ इंडस्ट्री नहीं बल्कि कम्पनी
भी देखनी है। गलत नीतियों के कारण बंद हुए उड़ीसा के वेदांता प्लांट और भोपाल के यूनियन कार्बाईड कम्पनी का उदाहरण देते हुए कहा कि आप जिस कम्पनी में इन्वेस्टमेंट करने जा रहे हैं उसका एनुवल रिपोर्ट जरुर पढ़िये। गौर कीजिये कि वे कोई बड़ा कर्ज तो नहीं लिये हैं। कानून का पालन तो कर रहे हैं!

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने संदेश में प्रसन्नता जताते हुए कहा कि इस कठिन दौर में भी विवि के विद्यार्थियों को घर बैठे ही शेयर बाजार के विभिन्न पहलूओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई। प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्ययक्ष, शिक्षकगण एवं विद्यार्थी इसके लिए बधाई के पात्र हैं।

वहीं प्रबंधन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पवनेश कुमार ने कहा कि यह व्याख्यान विद्यार्थियों, शोधार्थियों के साथ ही साथ हम सभी शिक्षकों के लिए भी बहुत ही उपयोगी साबित हुआ है। कोरोना जैसे वैश्विक संकट के दौर में शेयर बाजार में किस तरह निवेश करना है, आगे क्या स्थिति रहेगी, देश के आर्थिक विकास पर इसका क्या असर पड़ेगा इन बिंदुओं पर सभी को संतोषजनक जानकारी मिली है। प्रो. पवनेश ने इसके लिए प्रो. पाण्डेय और डॉ. अमित का ह्रदय से आभार भी जताया। इस ऑनलाइन व्याख्यान को अपनी सक्रिय उपस्थिति से सफल बनाने के लिए उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थियों और शेयर बाजार में रुचि रखने वाले सहभागी विद्वानों का भी आभार जताया। विद्यार्थियों-शोधार्थियों की तरफ से सिद्धार्थ घोष ने दोनों विशेषज्ञ व्याख्याताओं का आभार जताया साथ ही कार्यक्रम को बहुत ही उपयोगी बताया। इस ऑनलाइन व्याख्यान में प्रो. तपन नायक, डॉ. सपना सुगंधा, डॉ. दिनेश व्यास, कमलेश कुमार आदि शिक्षक, शशि रंजन, अविनाश कुमार, रौशन कुमार, अंकित वर्मा, देवाशीष राज, दीपू सिंह, हर्षवर्धन, कन्हाई शर्मा, शैलेष सिंह, श्वेता कुमारी, श्यामली कुमारी समेत बड़ी संख्या में शिक्षकों, विद्यार्थियों एव शोधार्थियों ने सहभागिता की।

Tuesday, May 5, 2020

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और युवा मन


डॉ.आदित्य कुमार मिश्रा-गोरखपुर, साथ में अजय कुमार, सुधाकर ओझा, राजकुमार पाण्डेय, उमेश तिवारी व शशांक द्विवेदी।
           सूचना एवं संचार क्रांति के युग में फेसबुक-ट्विटरवाट्सअप और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल माध्यमों के द्वारा बड़ी संख्या में लोगों की अभिव्यक्तियां सामने आ रही हैं। उपयोगकर्ताओं की मानसिकता के अनुसार ही कंटेट सामने आता है। इनमें से कुछ लोग कुछ विशिष्ट सूचनाएं देनेमनोरंजक विषय वस्तु प्रस्तुत करने और जागरुकता फैलाने का कार्य इन प्लेटफॉर्मों पर करते हैंजिसे पढ़कर या देख-सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। वहीं इन माध्यमों पर कुछ लोग नफरत से भरा संदेश डालते हैं तो कुछ लोग उस संदेश से प्रेरित होकर अपनी मुर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया डालते हैं और कुछ लोग लाइक और शेयर करके इस नफरत की आग को फैलाते रहते हैं। कुछ लोग अपने पुत्र-पुत्रीपड़ोसीरिश्तेदार और सेलिब्रिटी या दिवंगत महापुरुषों की जन्मदिनशादी की वर्षगांठपुण्यतिथि आदि अवसरों पर चित्र-विडियो और टेक्स्ट के सहारे अपनी शुभकामना या संवेदना व्यक्त करते हैं। शुभ-अवसरों के संदेशों की आवृत्ति भी एक सीमा के बाद चिड़चिड़ाहट पैदा करती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर इनकी आलोचना तंगदिली की निशानी हो सकती है इसलिए इस ओर ज्यादा कुछ नहीं कहना। लेकिन एक तरफ के लोगों द्वारा नफरत फैलानेबैठे-बिठाये प्रधानमंत्री कोवित्तमंत्री कोमुख्यमंत्री और पुलिस प्रशासन आदि को सलाह देनेताना मारने, ‘सच-झूठ’ जो भी मिले उसे नफरत की चाशनी में डालकर परोसने का काम किया जाता है तो दूसरी तरफ के लोगों द्वारा विपक्षी दल के नेताओंअपने से अलग विचारधारा के कलाकारों की अमर्यादित शब्दों और प्रतीकों से आलोचना करने का काम किया जाता है। दोनों ही खेमों का साथ देने वाले लोग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं। न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में भी एजेंडा के तहत आलोचनात्मक या चाटुकारितापूर्ण प्रसारण-प्रकाशन को पहचानना-समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। समाचार चैनलसमाचार पत्रसोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म हमारी दिनचर्या के हिस्सा बन चुके हैं। इन माध्यमों के बारे में कुछ न कुछ राय सभी के मन में होती है। इस संदर्भ में लालबाहदुर शास्त्री प्रबंधन संस्थान की प्रो. तृप्ति बर्थवाल का एक कथन बड़ा ही महत्वपूर्ण हैं जिसमें वह कहती हैं दिन भर न्यूज मत देखिये। देश-दुनिया से थोड़ा अवेयर ज़रुर रहिये, मगर मीडिया की अति से बचिये। ओवर इटिंग से वॉमेटिंग और डायरिया होती है। टीवी-न्यूज पेपर और सोशल मीडिया से कुछ अलग भी कीजिये। प्रो. बर्थवाल का यह कहना जायज है कि मीडिया से खबरों का ओवरडोज लेना ठीक नहीं है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हाथों में एंड्रायड मोबाइल और सस्ता डेटा लेकर आदमी करे तो क्या करे। वामेटिंग और डायरिया होता है तो हो जाए, आम लोग विशेषकर युवा 'हर फिक्र को धुएं में उड़ाकर' चलने पर आमादा हैं। जिनकी प्राथमिकताएं तय नहीं हैं या जिनके पास करने को कुछ खास नहीं है वे पहले ओवरडोज लेंगे फिर 'वॉमेटिंग और डायरिया' के शिकार भी बनेंगे और सवाल उठाने पर अपने लिए कोई ना कोई तर्क भी ढूंढ लेंगे।

           इस संबंध में पत्रकारिता के छात्र अजय कुमार का कहना है कि विकासवाद के तमाम उपक्रमों की तरह सोशल मीडिया की वजह से भी फेक न्यूजअफवाहघृणापूर्ण टिप्पणी आदि कई समस्याएं उत्पन्न हुई है। सूचना को परमाणु बम से भी अधिक खतरनाक माना जाता है ऐसे में इन चुनौतियों से निपटने के लिए उपयोगकर्ताओं के क्रियाकलापों पर लगाम लगाना आवश्यक हो गया है। सोशल मीडिया एकाउंट को आधार कार्डपैन कार्ड जैसे दस्तावेजों से जोड़ने होंगेंसाथ ही लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी।
            मीडिया स्टूडेंट राजकुमार पाण्डेय बताते हैं कि सोशल मीडिया जो लोगों की आवाज उठाने और सूचना के सुगम माध्यमों का जरिया था, अब लोगों द्वारा नफरत भरी बातों और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर विभिन्न समुदायों में नफरत भरने का कार्य कियाजा रहा है।  अगर हम सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों की बात करें तो यह समाज में सुलभ मीडिया के रूप में लोगों की अच्छी पहुंच बना रहा था। पर मुझे लगता है जब से राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने प्रचार का जरिया बनाया तब से वहां पर उनके पार्टियों का प्रचार कम समुदायों में वैमनस्य की भावना को लगातार भड़काने का कार्य किया जा रहा है। और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स समाज के कुंठित लोगों के अलावा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी नफरत फैलाने से बाज नहीं आता है। हालिया घटना पर गौर करें तो दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम ने जिस तरह से फेसबुक पर मुस्लिमों की हिंसा को लेकर टिप्पणी की थी वह उनकी कुंठित और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच को प्रदर्शित करता है जो कि किसी भी जिम्मेदार पद पर अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहे व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जाती है।                                               मीडिया स्टूडेंट शशांक द्विवेदी का कहना है कि पत्रकारिता आज पत्रकारिता नहीं रह गई बल्कि चाटुकारिता ज्यादा बन गई है। कहने को तो हम चौथे स्तंभ है लेकिन आज के समय में पत्रकारों की मनोदशा देख कर आश्चर्य होता है। कहने  का तात्पर्य ये है कि जिस तरह बड़े पत्रकारों और ईमानदार पत्रकारों की छवि को आज कल के फर्जी पत्रकार ने धोया है वो कहीं न कहीं समाज के लिए हानिकारक है । मीडिया के प्लेटफॉर्म वक़्त के साथ बढ़ गए। सोशल मीडिया में हजारों की संख्या में पत्रकार हो गए है जो कि अपने कृत्य से कई अनुभवी पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं। मीडिया जगत में हम सरकार ही नहीं अपितु समाज के भी ताने सुनते हैं। पत्रकारों को न्यूज़ छापने और सच्चाई दिखाने की स्वतंत्रता होती है लेकिन आज के युग में न्यूज भी सरकार या बड़े आदमियों से पूछ कर छापा जाता है अपितु ये कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया बिक चुकी है।
                 पत्रकारिता के छात्र उमेश तिवारी का कहना है कि आज फेसबुकट्विटरलिंक्डइन इत्यादि प्लेटफार्मों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। शिक्षकोंप्रोफेसरों और छात्रों के बीच ये काफी लोकप्रिय हो गया है। एक छात्र के लिए सोशल मीडिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह उनके लिए जानकारी को साझा करनेजवाब प्राप्त करने और शिक्षकों से जुड़ने में सहायता करता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से छात्र और शिक्षक एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और इस प्लेटफॉर्म का अच्छा उपयोग करके जानकारी साझा कर सकते हैं। सोशल मीडिया के बिना हमारे जीवन की कल्पना करना मुश्किल हैपरन्तु इसके अत्यधिक उपयोग के वजह से हमे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती हैं। सोशल मीडिया समाज के विकास में अपना योगदान देता है और कई व्यवसायों को बढ़ाने में भी मदद करता है। सोशल मीडिया मार्केटिंग जैसे साधन प्रदान करता है जो लाखों सशक्त ग्राहकों तक पहुंचाता है। हम आसानी से सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी और समाचार प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी सामाजिक मुद्दे पर जागरूकता पैदा करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग एक अच्छा साधन है। इच्छुक नौकरी तलाशने वालों को भी इससे सहायता मिलती है। यह व्यक्तियों को बिना किसी हिचकिचाहट के दुनिया के साथ सामाजिक विकास और बातचीत करने में मदद कर सकता है। बहुत से लोग उच्च अधिकारियों के प्रोत्साहित भाषण को सुनने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। यह आपको लोगों से मेल-जोल बढ़ाने में भी मदद कर सकता है। सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग निद्रा को प्रभावित करता हैं। साइबर बुलिंगछवि खराब होना आदि जैसे कई अन्य नकारात्मक प्रभाव भी हैं। सोशल मीडिया की वजह से युवाओं में 'गुम हो जाने का भय' (एफओएमओ) अत्यधिक बढ़ गया है। सोशल मीडिया लोगों में निराशा और चिंता पैदा करने वाला एक कारक है। ये बच्चों में खराब मानसिक विकास का भी कारण बनते जा रहा है। सोशल मीडिया के कई नुकसान और भी हैं जैसे: साइबर बुलिंग ,हैकिंगव्यक्तिगत डेटा का नुकसान, (जो सुरक्षा समस्याओं का कारण बन सकता है) तथा आइडेंटिटी और बैंक विवरण चोरी जैसे अपराध और बुरी आदतें (सोशल मीडिया का लंबे समय तक उपयोगयुवाओं में इसके लत का कारण बन सकता है। बुरी आदतो के कारण महत्वपूर्ण चीजों जैसे अध्ययन आदि में ध्यान खोना हो सकता है)  सामाजिक और पारिवारिक जीवन का नुकसानरिश्ते में धोखाधड़ीहनीट्रैप्स और अश्लील एमएमएस सबसे ज्यादा ऑनलाइन धोखाधड़ी का कारण हैं। लोगो को इस तरह के झूठे प्रेम-प्रंसगो में फंसाकर धोखा दिया जाता है। सोशल मीडिया पर हमे उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की जॉच कर लेनी चाहिए क्योंकि सोशल मीडिया का आजकल हमारे जीवन में होने वाले सबसे हानिकारक प्रभावो में से एक माना जाने लगा हैऔर इसका गलत उपयोग करने से बुरा परिणाम सामने आ सकता है।
         पत्रकारिता के छात्र सुधाकर ओझा का कहना है कि सोशल मीडिया के उपयोग के फायदे तो बहुत है पर दुरुपयोग भी बहुत हो रहा है। एक घटना याद आ रही है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तबीयत बहुत खराब थी और वह हॉस्पिटल में एडमिट थे तो किसी के द्वारा एक अफवाह फैलाई गई की योगी आदित्यनाथ जी के पिता का देहांत हो चुका है अब वह खबर कई ग्रुपों में चली लेकिन जब मैंने उसकी पुष्टि की तो गलत थी, तब वह जीवित थे। इसके अलावा एक चीज और देखने को मिलती है कि लोगों द्वारा खासतौर एक दूसरे के धर्म और महिलाओं को लेकर जो बहुत ही गलत तरीके से टिप्पणियां की जाती हैं। कुछ लोग एक दूसरे के धर्म की मान्यताओं को गलत साबित करने में लगे रहते हैं। जिसको देखकर मन बहुत दुखी होता है और इस कारण समाज में कितना मतभेद फैला हुआ है आजकल एक नया ट्रेंड चला है सोशल मीडिया में किसी का प्रचार, किसी का दुष्प्रचार नेताओं या समर्थकों द्वारा किसी भी दूसरे नेता के फोटो-वीडियो को एडिट कर छवि धूमिल करने की कोशिश की जाती है लेकिन जब सच्चाई पता चलती है तो सोशल मीडिया से डर भी लगने लगता है। अभी कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक में किसी व्यक्ति द्वारा एक पोस्ट देखा जिसमें लिखा था मैं भारत को बर्बाद कर दूंगा और उसके नीचे प्रधानमंत्री की फोटो लगी थी यह देखकर बहुत ही बुरा लगा और मैंने उन महानुभव से अनुरोध किया कि इस प्रकार की पोस्ट तुरंत डिलीट कर दें।